Friday, December 26, 2014
हिमशैल
तन्हाई
याद आये
अब नहीं
अपने - अपने
स्याह साए
नींव
पत्थर की मूरत
सन्नाटा
कैद में उसके
जाने कब बने?
Wednesday, July 16, 2014
some lines
काँटों से गुज़र जाना, शोलों से निकल जाना,
जब फूलों की बस्ती आए तो संभल कर जाना।
दिन अपने चिराग़ों से कुछ इस तरह जलते हैं,
हर सुबह को बुझ जाना, हर शाम को जल जाना।
बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी
एक मुद्दत से हमें उसने सताया भी नहीं
1. आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक?
बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी
एक मुद्दत से हमें उसने सताया भी नहीं
2. दाम हर मौज में है हल्का-ए-सद-काम-ए-नाहंग,
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक।
[दाम = जाल/फँदा, मौज = लहर, हल्का = घेरा, सद = सौ, नाहंग = मगरमच्छ, सद-काम-ए-नाहंग = सौ जबड़ों वाला मगरमच्छ, गुहर = मोती]
3. आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक?
[सब्र = धैर्य, तलब = चाह/खोज]
4. हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे, लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुमको ख़बर होने तक।
[तग़ाफ़ुल = उपेक्षा/अनदेखी]
5. परतव-ए-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की तालीम,
मैं भी हूँ इक इनायत की नज़र होने तक।
[परतव-ए-ख़ुर = सूरज की किरण/प्रतिबिंब, शबनम = ओस, फ़ना = नश्वरता/मिट जाना, इनायत = कृपा]
6. यक-नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल,
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर होने तक।
[बेश = बहुत, फ़ुर्सत-ए-हस्ती = जीवन का समय, ग़ाफ़िल = बेख़बर, रक़्स = नृत्य, शरर = चिंगारी]
7. ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किससे हो जुज़ मर्ग इलाज,
शम्मा हर रंग में जलती है सहर होने तक।
[हस्ती = जीवन/अस्तित्व, जुज़ = सिवाय/के अलावा, मर्ग = मृत्यु, सहर = सुबह]
तमाम उम्र उसी के ख़याल में गुज़री ‘फ़राज़’,
मेरा ख़याल जिसे उम्र भर नहीं आया।
ये दिन भी क़यामत की तरह गुज़रा है ‘फ़राज़’,
जाने क्या बात थी हर बात पे रोना आया।
बस वो शख़्स अच्छा लगा, उसे साफ़ कह डाला हमने ‘फ़राज़’,
दिल की बात है, हमसे मुनाफ़िक़त न हो सकी।
एक ख़लिश अब भी मुझे बेचैन करती है ‘फ़राज़’,
सुन के मेरी मरने की ख़बर वो रोया क्यों था।
बहुत अजीब हैं ये बंदिशें मोहब्बत की ‘फ़राज़’,
न उसने क़ैद में रखा, न हम फ़रार हुए।
कुछ इस तरह नज़रअंदाज़ हो गए ‘फ़राज़’,
जैसे इज़ाफ़ी हर्फ़ थे तेरी ज़िंदगी की किताब में।
तुझ से बिछड़ के बचपन का ये भेद खुला,
क्यों लिखता था मैं पैरों पे “तन्हा तन्हा”।
कोई नहीं है मेरे जैसा चारों ओर,
अपने गिर्द एक भीड़ सजा के “तन्हा” हूँ।
प्यार में इक ही मौसम है बहारों का ‘फ़राज़’,
लोग कैसे मौसमों की तरह बदल जाते हैं।
जब ख़िज़ां आएगी तो लौट आएगा वो भी ‘फ़राज़’,
वो बहारों में ज़रा कम ही निकला करता है।
सिलसिला टूटा नहीं दर्द की ज़ंजीर का।
आज दिल खोल के रोए हैं तो यूँ खुश हैं ‘फ़राज़’,
चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे।
हिज्र की रात बहुत लंबी है ‘फ़राज़’,
आओ उसकी याद में थक के सो जाएँ।
कुछ तू ही मेरे दर्द का मफ़हूम समझ ले ‘फ़राज़’,
हँसता हुआ चेहरा तो ज़माने के लिए है।
तुम ताल्लुक तोड़ने का कहीं ज़िक्र न करना ‘फ़राज़’,
मैं लोगों से कह दूँगा कि उसे फ़ुर्सत नहीं मिलती।
ज़लज़ले यूँ ही बे-सबब नहीं आते ‘फ़राज़’,
कोई दीवाना तह-ए-ख़ाक तड़पता होगा।
मैंने जिस शाख़ को फूलों से सजाया था ‘फ़राज़’,
मेरे सीने में उसी शाख़ का काँटा उतरा।
हम न बदलेंगे वक़्त की रफ़्तार के साथ ‘फ़राज़’,
हम जब भी मिलेंगे अंदाज़ पुराना होगा।
बड़ा अँधेरा था उनकी राहों में ऐ दिल ‘फ़राज़’,
मैं अपना घर न जलाता तो और क्या करता।
हमने महबूब जो बदला तो तअज्जुब कैसा ‘फ़राज़’,
लोग काफ़िर से मुसलमान भी तो हो जाते हैं।
वो भी रो देगा उसे हाल सुनाएँ कैसे,
मोम का घर है चिरागों को जलाएँ कैसे।
दूर होता तो उसे ढूँढ भी लेते ‘फ़राज़’,
रूह में छुप के जो बैठा है उसे पाएँ कैसे।
मैंने तो अपनी तन्हाइयों से तंग आकर दोस्त बनाए थे ‘फ़राज़’,
दोस्त भी ऐसे मिले कि मुझे और तन्हा कर गए।
मुझे ग़ुरूब न जानो जो मैं उफ़क़ पे नहीं ‘फ़राज़’,
बिखर गया हूँ अँधेरों में कहकशाँ की तरह।
बहाना क्यों तराशा रूठ जाने का ‘फ़राज़’,
बस इतना कह देते कि दिल में जगह नहीं रही।
पहले तराशा उसने मेरा वजूद शीशे से ‘फ़राज़’,
फिर ज़माने भर के हाथों में पत्थर थमा दिए।
पानी में अक्स देख कर खुश हो रहा था ‘फ़राज़’,
पत्थर किसी ने मार कर मंज़र बदल दिया।
ऐ इंसान, इब्न-ए-आदम से नंगा आया है तू ‘फ़राज़’,
कितना सफ़र किया है तूने दो गज़ कफ़न के लिए।
अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे ‘फ़राज़’,
क्यों तन्हा से हो गए हैं तेरे जाने के बाद।
एक ही ज़ख़्म नहीं, सारा बदन ज़ख़्मी है ‘फ़राज़’,
दर्द हैरान है कि उठूँ तो कहाँ से उठूँ।
सब रौशनियाँ मुझसे रूठ गईं ये कह कर ‘फ़राज़’,
तुम अपने चिरागों की हिफ़ाज़त नहीं करते।
तमाम उम्र मुझे टूटना बिखरना था ‘फ़राज़’,
वो मेहरबान भी कहाँ तक समेटता मुझे।
लोग कहते हैं कि मुलाक़ात नहीं हुई ‘फ़राज़’,
हम तो रोज़ मिलते हैं लेकिन बात नहीं होती।
मैं जो महका तो मेरी शाख़ जला दी उसने ‘फ़राज़’,
सब्ज़ मौसम में मुझे ज़र्द हवा दी उसने।
टूट कर चुभ रहा है आँखों में ‘फ़राज़’,
आईना तो नहीं था ख़्वाब मेरा।
दाग़ दामन के हों, दिल के हों या चेहरे के ‘फ़राज़’,
कुछ निशान उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं।
इश्क़ की राह में दो ही मंज़िलें ‘फ़राज़’,
या दिल में उतर जाना, या दिल से उतर जाना।
आँख मसरूफ़-ए-नज़ारा थी तो हम खुश थे ‘फ़राज़’,
तुमने क्या ज़ुल्म किया दिल में ठिकाना कर के।
तेरे ख़ुलूस ने बर्बाद कर दिया है ‘फ़राज़’,
फ़रेब देते तो कब के संभल गए होते।
तुम से बिछड़ कर ज़ेहन ऐसा हुआ मुंतशिर ‘फ़राज़’,
कि लोगों से अपने घर का पता पूछना पड़ा।
ज़माने के सवालों को मैं हँस के टाल दूँ ‘फ़राज़’,
लेकिन नमी आँखों की कहती है “मुझे तुम याद आते हो।”
ये दिन भी क़यामत की तरह गुज़रा है ‘फ़राज़’,
जाने क्या बात थी हर बात पे रोना आया।
बस वो शख़्स अच्छा लगा, उसे साफ़ कह डाला हमने ‘फ़राज़’,
दिल की बात है, हमसे मुनाफ़िक़त न हो सकी।
एक ख़लिश अब भी मुझे बेचैन करती है ‘फ़राज़’,
सुन के मेरी मरने की ख़बर वो रोया क्यों था।
बहुत अजीब हैं ये बंदिशें मोहब्बत की ‘फ़राज़’,
न उसने क़ैद में रखा, न हम फ़रार हुए।
कुछ इस तरह नज़रअंदाज़ हो गए ‘फ़राज़’,
जैसे इज़ाफ़ी हर्फ़ थे तेरी ज़िंदगी की किताब में।
तुझ से बिछड़ के बचपन का ये भेद खुला,
क्यों लिखता था मैं पैरों पे “तन्हा तन्हा”।
कोई नहीं है मेरे जैसा चारों ओर,
अपने गिर्द एक भीड़ सजा के “तन्हा” हूँ।
प्यार में इक ही मौसम है बहारों का ‘फ़राज़’,
लोग कैसे मौसमों की तरह बदल जाते हैं।
जब ख़िज़ां आएगी तो लौट आएगा वो भी ‘फ़राज़’,
वो बहारों में ज़रा कम ही निकला करता है।
जिस को भी चाहा उसे शिद्दत से चाहा है ‘फ़राज़’,
सिलसिला टूटा नहीं दर्द की ज़ंजीर का।
आज दिल खोल के रोए हैं तो यूँ खुश हैं ‘फ़राज़’,
चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे।
हिज्र की रात बहुत लंबी है ‘फ़राज़’,
आओ उसकी याद में थक के सो जाएँ।
कुछ तू ही मेरे दर्द का मफ़हूम समझ ले ‘फ़राज़’,
हँसता हुआ चेहरा तो ज़माने के लिए है।
तुम ताल्लुक तोड़ने का कहीं ज़िक्र न करना ‘फ़राज़’,
मैं लोगों से कह दूँगा कि उसे फ़ुर्सत नहीं मिलती।
ज़लज़ले यूँ ही बे-सबब नहीं आते ‘फ़राज़’,
कोई दीवाना तह-ए-ख़ाक तड़पता होगा।
मैंने जिस शाख़ को फूलों से सजाया था ‘फ़राज़’,
मेरे सीने में उसी शाख़ का काँटा उतरा।
हम न बदलेंगे वक़्त की रफ़्तार के साथ ‘फ़राज़’,
हम जब भी मिलेंगे अंदाज़ पुराना होगा।
बड़ा अँधेरा था उनकी राहों में ऐ दिल ‘फ़राज़’,
मैं अपना घर न जलाता तो और क्या करता।
हमने महबूब जो बदला तो तअज्जुब कैसा ‘फ़राज़’,
लोग काफ़िर से मुसलमान भी तो हो जाते हैं।
वो भी रो देगा उसे हाल सुनाएँ कैसे,
मोम का घर है चिरागों को जलाएँ कैसे।
दूर होता तो उसे ढूँढ भी लेते ‘फ़राज़’,
रूह में छुप के जो बैठा है उसे पाएँ कैसे।
मैंने तो अपनी तन्हाइयों से तंग आकर दोस्त बनाए थे ‘फ़राज़’,
दोस्त भी ऐसे मिले कि मुझे और तन्हा कर गए।
बिखर गया हूँ अँधेरों में कहकशाँ की तरह।
बहाना क्यों तराशा रूठ जाने का ‘फ़राज़’,
बस इतना कह देते कि दिल में जगह नहीं रही।
कब मुझ को ऐतिराफ़-ए-मुहब्बत न था ‘फ़राज़’,
कब मैंने ये कहा था सज़ाएँ मुझे न दो।
पहले तराशा उसने मेरा वजूद शीशे से ‘फ़राज़’,
फिर ज़माने भर के हाथों में पत्थर थमा दिए।
हम सुना रहे थे अपनी बेवफ़ाई का क़िस्सा ‘फ़राज़’,
अफ़सोस इस बात का—औरों ने तो वाह-वाह की, उन्होंने भी वाह-वाह की।
पानी में अक्स देख कर खुश हो रहा था ‘फ़राज़’,
पत्थर किसी ने मार कर मंज़र बदल दिया।
ऐ इंसान, इब्न-ए-आदम से नंगा आया है तू ‘फ़राज़’,
कितना सफ़र किया है तूने दो गज़ कफ़न के लिए।
अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे ‘फ़राज़’,
क्यों तन्हा से हो गए हैं तेरे जाने के बाद।
एक ही ज़ख़्म नहीं, सारा बदन ज़ख़्मी है ‘फ़राज़’,
दर्द हैरान है कि उठूँ तो कहाँ से उठूँ।
सब रौशनियाँ मुझसे रूठ गईं ये कह कर ‘फ़राज़’,
तुम अपने चिरागों की हिफ़ाज़त नहीं करते।
वो मेहरबान भी कहाँ तक समेटता मुझे।
लोग कहते हैं कि मुलाक़ात नहीं हुई ‘फ़राज़’,
हम तो रोज़ मिलते हैं लेकिन बात नहीं होती।
मैं जो महका तो मेरी शाख़ जला दी उसने ‘फ़राज़’,
सब्ज़ मौसम में मुझे ज़र्द हवा दी उसने।
टूट कर चुभ रहा है आँखों में ‘फ़राज़’,
आईना तो नहीं था ख़्वाब मेरा।
तुम्हारी दुनिया में हम जैसे हज़ारों हैं ‘फ़राज़’,
हम ही पागल थे जो तुम्हें पा कर इतराने लगे।
दाग़ दामन के हों, दिल के हों या चेहरे के ‘फ़राज़’,
कुछ निशान उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं।
इश्क़ की राह में दो ही मंज़िलें ‘फ़राज़’,
या दिल में उतर जाना, या दिल से उतर जाना।
आँख मसरूफ़-ए-नज़ारा थी तो हम खुश थे ‘फ़राज़’,
तुमने क्या ज़ुल्म किया दिल में ठिकाना कर के।
तेरे ख़ुलूस ने बर्बाद कर दिया है ‘फ़राज़’,
फ़रेब देते तो कब के संभल गए होते।
तुम्हारी दुनिया में हम जैसे हज़ारों हैं ‘फ़राज़’,
हम ही पागल थे जो तुम्हें पा कर इतराने लगे।
दाग़ दामन के हों, दिल के हों या चेहरे के ‘फ़राज़’,
कुछ निशान उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं।
इश्क़ की राह में दो ही मंज़िलें ‘फ़राज़’,
या दिल में उतर जाना, या दिल से उतर जाना।
आँख मसरूफ़-ए-नज़ारा थी तो हम खुश थे ‘फ़राज़’,
तुमने क्या ज़ुल्म किया दिल में ठिकाना कर के।
तेरे ख़ुलूस ने बर्बाद कर दिया है ‘फ़राज़’,
फ़रेब देते तो कब के संभल गए होते।
बशीर साहिब- चुनिन्दा शायरी
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फ़ासले से मिला करो।
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा,
इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जायेगा।
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जायेगा।
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों।
एक दिन तुझ से मिलने जरूर आऊंगा
जिंदगी मुझ को तेरा पता चाहिए।
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
पलकें भी चमक जाती हैं सोते में हमारी,
आंखों को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते।
तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था,
फिर उस के बाद मुझे कोई अजनबी नहीं मिला।
जिस पर हमारी आंख ने मोती बिछाये रात भर
भेजा वही क़ाग़ज उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं।
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता।
जैसे सर्दियों में गर्म कपड़े दे फ़क़ीरों को,
लबों पे मुस्कुराहट थी मगर कैसी हिकारत सी।
अजीब शख्स है नारा होके हंसता है,
मैं चाहता हूं ख़फ़ा हो, तो ख़फ़ा ही लगे।
देने वाले ने दिया सब कुछ अजब अंदाज से,
सामने दुनिया पड़ी है और उठा सकते नहीं।
मिल भी जाते हैं तो कतरा के निकल जाते हैं,
हाय मौसम की तरह दोस्त बदल जाते हैं।
हम अभी तक हैं गिरफ़्तार-ए-मुहब्बत यारों,
ठोकरें खा के सुना था कि सम्भल जाते हैं।
मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो,
मेरी तरह तुम भी झूठे हो।
कभी हम भी इस के क़रीब थे, दिलो जान से बढ़ कर अज़ीज थे,
मगर आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला ना हो।
कभी धूप दे, कभी बदलियां, दिलोजान से दोनों कुबूल हैं,
मगर उस नगर में ना कैद कर, जहां जिन्दगी की हवा ना हो।
Wednesday, June 25, 2014
शाम सवेरे
सुहानी कितनी लग रही।
बहने लगी फिर से-
मंद सुगंध हवा और साथ
चहचहाने लगीं चिड़ियाँ।
रंग क्षितिज पर इन्द्रधनुषी सा
बिखर पास अपने बुला रहा।
थकान दिन भर की,
पसीने दुपहरी के
सब घुल मिल - सिरहन सी दौड़ा रहे।
बस पानी देना रहा बाकी
कहते फूल बगिया के मेरे।
हौले-हौले तन जायेगी
चादर काली रात की।
जगमगा उठेंगे जुगनूओं से
टिमटिमाते चाँद तारे।
फिर ढल रात, निखरेगी
एक नए सवेरे में।
सोचता हूँ-सुस्ता लूं थोड़ा
एक नए दिन के लिए
जो आयेगा उम्मीदें नयी लिए।
पर फर्क कहाँ नजर कोई आया
शाम हो या सवेरा
एक ढलता तो दूजा चढ़ता
मेरे इस सफर में।
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रूढीयाँ
सारे घर में घूमती रहती
निःसंकोच, निर्भय;
पैरों में बंधे घुंघरू,
बजते रहते-छन, छन, छन।
एक पल भी बैठती नहीं
पास मेरे चैन से-
बीच कदमों से निकल भागती।
खाना दो तो-कतरा जाती,
जाने कुछ ढूंढ रही, घर में मेरे
बस घूमती ही रहती बेचैन सी
छन, छन, छन।
अनायास ही कूद खिड़की
जाने कहाँ चली जाती।
धीरे-धीरे आवाज़ घुंघरूओं की
कमजोर पड़ने लगती-
बस दूर तक-देखता उसे मैं
ओझल होते लाल-पीले फूलों से
दूर लहलहाती झाड़ियों की ओट से।
काले, भूरे चितकबरे रंगों की
सफ़ेद स्याह, वह बिल्ली।
फिर अचानक चौंक कर
उठ पड़ता- गहरे स्वप्न से
देखता पास खड़ी
घूरती-लाल लाल आँखों से
अजीब सी, डरावनी-
पर भोली-भाली, प्यारी बिल्ली।
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Tuesday, June 24, 2014
तबाही
इतनी तो हुई ही नहीं ।
फिर नदी यह
उफन रही - क्यों इतनी?
तोड़ किनारे अपने सब
रास्तों को लगी बहाने,
ढहाने लगी दीवारें घरों की
डुबो रही खेत खलिहान।
कहते हैं- सदियों पहले
उठे थे लपलपाते शोले
इन पहाड़ों पर बसे जंगलों से।
काले भयावह धुंए ने
ढांप दिये सूरज चाँद।
चारों तरफ फ़ैल गयी चादर अंधियारी
ना कुछ दिखता, ना ही सूझता।
कुछ झुलस स्वाहा हुए
और कुछ घुट बदहवास।
लगता है- धूंआ वही अब
बादल बन बरस रहा।
वरना नीयत ही नहीं -
नदी की किनारे तोड़ने की।
ना ही नीयति गावों की
देर सबेर बह जाने की।
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24-06-14
Tuesday, June 17, 2014
लोग तो -
तुम एक हाथ उठा देख, किस सच की उम्मीद लगाए बैठे हो।
लोग तो गले मिल कर भी, ज़ख्म गहरा दिल पर लगा देते हैं,
तुम सर झुका देख उनका, किस वफ़ा की तलाश में बैठे हो ।
लोग तो कहकहों से, आँसू हज़ार दामन में बिखेर देते हैं,
तुम हल्की सी मुस्कान पर किसकी, दुनिया अपनी लुटाये बैठे हो ।
लोग तो मौका मिलते ही, याराना सदियों का भुला बैठते हैं
तुम पल पल याद कर, कोशिश में किसे भूलाने बैठे हो ।
उसके लिए-
शब्द एक मैं उसके लिये -
नित नए भावों में सजा मुझे
कविता अपनी निखार रहा ।
तलाश कर रहा वह - एक नयी धुन
स्वर एक मैं, उसके लिये -
साज पर अपने तरंगों में सजा
कविता में प्राण नए फूंक रहा ।
देखा है मैंने उसे - खींचते आड़ी तिरछी रेखाएं
रंग एक मैं, उसके लिए -
तूली पर अपनी सजा
सपनों को आकार इन्द्रधनुषी दे रहा ।
लहरों सा बार बार भेजता मुझे
कभी सीपी देकर, तो कभी मोती
सब कुछ किनारे धर बेकल सा मैं
बार बार लौट - समा जाता उसमें ।
हाय री किस्मत-
अचानक मिले जो तुम,
चौंका दिया मुझे
आज पहली बार।
रोता बिलखता छोड़
जाने कहाँ गुम हो गए - निर्मोही ।
आज साथ ले जाने को
इतने क्यों तत्पर ?
जाने गिले - शिकवे कितने,
कितने किस्से अधूरे- कहने तुमसे ।
कहाँ-कहाँ भटकता, ढूँढता
नहीं फिरा मैं।
कोई पता भी ना दिया
पूछूं तो किससे पूछूं ।
ना मुझे कोई यहाँ जानता,
ना तुम्हें कोई पहचानता,
कहो - कहाँ ओझल हो गए तुम?
मनमीत मेरे-
मैं ही जानता - कटे कैसे मेरे दिन रात।
वो निश्छल चेहरा तुम्हारा, वो कोमल स्पर्श
वो मीठे बोल , वो सपने सुहाने
समय की धार पर - सब धुलते गए।
जाने कितनों से मिला और कितनों से बिछड़ा
कितना संजोया, और लुटाया
कभी मुस्कुराता तो कभी पोंछता आँसू
जहां भी रहा - एक टीस सी रही
मन के अन्दर
और मन के कोने में
इंतज़ार तुम्हारा।
आंसूओं पर मेरे मत जाओ
मुझे ही नहीं मालूम
घुले हैं इनमें ना जाने
कितने खुशी और कितने गम।
देख तुम्हें आज अचानक यहाँ
इतराऊँ या कोसूं किस्मत अपनी?
साथ अपने ले चलने का
कर रहे हो वादा या
फिर किसी और मेले में
छोड़ बिलखता-
ओझल होने का तो
नहीं कोई इरादा?
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अधूरा स्वप्न
साथ साथ मेरे - फिर भी
रोम रोम मेरे सिहर रहे.
मैं जहां भी रहूँ - जो भी करूं
संग मेरे - रहते हो तुम.
अभी अभी - जो छू कर गयी
अभी अभी - जो छल कर गयी
नित नए रंगों में ढल, आते - जाते
पल पल नूतन - स्पर्श हो तुम.
कोई मेरे आगे, कोई मेरे पीछे
भीड़ में मैं , मुझमें भीड़
कोई कहता कुछ , कोई सुनता कुछ
मन का मेरे शांत - कोलाहल हो तुम.
ना मैं तुमसे अछूता , ना तुम मुझसे
परे परे रहकर भी , एक दूसरे को निहोराते
सब कुछ संजोया मेरा- बिखर सा जाता
दर्पण में छिपा , एहसास मेरा हो तुम.
------------/-------------------+-
जीवन कल
सागर लहरों के रेले.
किये थे जिन्होंने
कभी पर्वतों को
रेतीले टीले .
अब सर धुनता सागर
जब सोख लेते ,
हर लहर
वही रेतीले टीले.
परिसीमित कर दिया
सागर का अहम्,
समय के फेर ने.
काँप गया ,
तूफ़ान का जोर
बिजली सी दौड़ा दी ,
आसमान में
जब देखा
हल्की सी हवा में
टूटते पत्ते को
मिट्टी बन ,
मजबूत करते जड़ों को.
हर महाविनाश पर ,
बोया जा रहा
बीज नया
संचार होता नवजीवन
रोक नहीं पाया कोई
निर छल, निर्मल ,
पावन-पल पल
समय की
मद्धम धार
अविरत ,
अनंत और अगाध.
----------------------------
महक
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महक मेरे मन की -
अब तक छिपी हुई -
सीप में मोती सी.
कभी निकलने को बेकल
कभी डरी सहमी सी-
गुमसुम.
मुठ्ठी में क़ैद -
एक जुगनू बिखेरता
चमक अपनी.
बेखबर क़ैद से-
अनजान दिन से .
जाने कहाँ तक
फैले खुशबू.
जाने कब तक
रहे चमक.
ना रोके रुकती खुशबू
ना बांधे बंधती चमक.
कोई होड़ नहीं खुशबूओं में
मदमस्त बहती
तरंगों पर हवाओं
के साथ छिप जाती
कलि में फिर
फूल से बिखरती .
चमक चमकती पेड़ों पर
अनजान अपनी ही
पहचान से.
महक मेरे मन की
बेकल-छिपी हुई...
बेकल बिखरने को ..
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गुलदस्ता
काट-छांट कर सजाये हुए।
कट गयी हैं जड़ें किसी की
तो कट गयी- शाख, पत्ती किसी की।
खुशबू से सरोकार नहीं किसीको
सब हैं रंगों को देख बेकाबू।
कभी नहाते थे फूल यही-
रौशनी सूरज चाँद की में
अब चुंधिया से जाते-
देख टिमटिमाती दुकान की रौशनी।
आंधी, तूफ़ान, बिजली-
देख कभी ना ये लरजे।
अब काँप से जाते-
देख मंडराते भौंरे, तितली।
कोइ सिहर सा जाते, कोई लजा सा जाता
पाकर हल्का सा स्पर्श।
जाने कौन देश इनका
जाने कौन सी मिट्टी पानी-
रंग बिखेरते सब,
सजे यहाँ - एक गुलदस्ते में।
खाना - पीना मिलता, मुस्कुराने भर को
इजाजत नहीं मुरझाने की।
बाजार भरा खरीददारों से,
नीलामी कहीं, तो कहीं होते मोलभाव।
मतलब निकल जाने भर का इन्तजार
खरीददारों को- गुलदस्ते से।
फिर फेंक देते सजाने- ढेर कचरे के।
क्यों सिहर जाता मैं- क्यों मुस्कुराते तुम
देख दुकान पर- रंग बिरंगा गुलदस्ता।
--------------
सुलगती जिन्दगी...
उठता है धुँआ-
सब कुछ कर देता धूमिल।
सूझने समझने की कोशिशे
घुट सी जाती।
इसी धूएँ की परत दर परत ऊपर
बिखरे हैं बादल सपनों के-
उजले सफ़ेद जगमगाते से दिखते
जब भी किरण आशा की
छन कर आती इनसे।
बरसेंगे बादल, यकीन है मुझे-
चल रही मंद सुगंध
मेरी चाहत की हवा।
छट जाएगा धुँआ
दूर हो जायेगी बेचैन घुटन।
थोड़ा सा इन्तजार,
थोड़ा सा सब्र
भर रहा हूँ साँसों से
अपने इस-सुलगते जीवन में।
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09जून 14
Monday, February 24, 2014
मुसाफिर
जब भी आता वह-
पिश्ते, बादाम, खजूर के साथ
कथा परियों की सुनाता जाता।
आजकल बड़ा उदास रहता वह
पूछो तो -
मुठ्ठी भर रेत उड़ाता और
रूह तक मेरी
रुला जाता वह।
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14 Feb 14
Friday, February 14, 2014
सपने
जब भी आता वह-
पिश्ते, बादाम, खजूर के साथ
कथा परियों की सुनाता जाता।
आजकल बड़ा उदास रहता वह
पूछो तो - रूह तक मेरी
रुला जाता वह।
-----------
14 Feb 14
Thursday, February 13, 2014
मनमीत
बोल पर मेरे मत जाओ
अचानक मिले जो तुम,
चौंका दिया मुझे
आज पहली बार।
रोता बिलखता छोड़
जाने कहाँ गुम हो गए - निर्मोही ।
आज साथ ले जाने को
इतने क्यों तत्पर ?
जाने गिले - शिकवे कितने,
कितने किस्से अधूरे- कहने तुमसे ।
कहाँ-कहाँ भटकता, ढूँढता
नहीं फिरा मैं।
कोई पता भी ना दिया
पूछूं तो किससे पूछूं ।
ना मुझे कोई यहाँ जानता,
ना तुम्हें कोई पहचानता,
कहो - कहाँ ओझल हो गए तुम?
मनमीत मेरे-
मैं ही जानता - कटे कैसे मेरे दिन रात।
वो निश्छल चेहरा तुम्हारा, वो कोमल स्पर्श
वो मीठे बोल , वो सपने सुहाने
समय की धार पर - सब धुलते गए।
जाने कितनों से मिला और कितनों से बिछड़ा
कितना संजोया, और लुटाया
कभी मुस्कुराता तो कभी पोंछता आँसू
जहां भी रहा - एक टीस सी रही
मन के अन्दर
और मन के कोने में
इंतज़ार तुम्हारा।
आंसूओं पर मेरे मत जाओ
मुझे ही नहीं मालूम
घुले हैं इनमें ना जाने
कितने खुशी और कितने गम।
देख तुम्हें आज अचानक यहाँ
इतराऊँ या कोसूं किस्मत अपनी?
साथ अपने ले चलने का
कर रहे हो वादा या
फिर किसी और मेले में
छोड़ बिलखता-
ओझल होने का तो
नहीं कोई इरादा?
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12 Feb14