Friday, December 26, 2014

हिमशैल

हिमशैल एक
यायावर सा, अनंत सागर में
जाने कब से बहे चले जा रहा।
अगिनत तूफानों संग
इसने भी ली मदमस्त हिलोरें ।
तपती, झुलसती गर्मी
ठिठुरती, कंपकंपाती सर्दी
नहीं कर सकी विचलित इसे।
बस एक लकीर बुलबुलों की
बनाता जाता - पर
अगले ही पल-
सागर उन्हें मिटाता जाता।
जूझ एक अजीब सी
सागर के संग
नित नए सूरज
नित नए रंग।
इसी सागर ने अपने ही अन्दर
छिपा रखा है अस्तित्व इसका
और यह
शनै शनै घुलता जाता
इसी सागर की गोद।

तन्हाई

कुछ भी तो नहीं
इर्द गिर्द मेरे।
एक तन्हाई-इस अँधेरे में
और इसमें छिपा 
दुबका कोने में मैं ।

दूर से बवंडर कोई उठ रहा
साँय-साँय हवा चल रही
ठिठुर रहा जाड़े में।
रौशनी हल्की सी - दीये की
पल पल काँपती और
साथ मुझे सिहरा देती।
उठकर संभालूं दीये को
हिम्मत नहीं इतनी ।
कोई भी नहीं इस घर में
एक तन्हाई और उसमें
छिपा मैं।

बीते युगों की यादें
टकराती इन खोखली दीवारों से
सायों सी उभरती-ओझल हो जाती
गुनगुनाता मैं- पर आवाज
दब रह जाती-गरजते बादलों बीच।
घुट रह जाती लौ दीये की
कौंधती देख बिजलीयाँ।
पल भर को देख लेता
बिखरा सामान घर के हर कोने
कभी संजोया था बहा पसीना अपना
अब तो सब कुछ कोरा सा लगता।
समेट लेगा तूफ़ान- किसी भी पल
बहा ले जाएगा- हौले हौले बढ़ता पानी।
गहराता ही जा रहा अंधियारा
सूना रह जाएगा कमरा
बुझा रह जाएगा दीया।
बस बहता रहेगा पानी
गरजते रहेंगे बादल
सिहराता रहेगा तूफ़ान और टकराती रहेंगी यादें।
छिपा रह जाऊँगा मैं
साथ अपनी तन्हाई।
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याद आये

देख दुश्मनों के अहले करम
कुछ दोस्त पुराने याद आये।

नन्हीं उंगलियाँ उठीं लपकने आसमां
वो ख्वाब पुराने याद आये।

दश्ते वीरान से, मचल उठी हवाएं
नज़ारे बागे बहाराँ याद आये।

बिजलियाँ रात भर, गरजती रहीं बादलों में
वो रुख से किसी का, सरकता नकाब याद आये।

अब नहीं

 
वाईस मैखाने में जाता नहीं, 
पता खुदा का कोई और नहीं।
 
कहते हैं किस जर्रे में वो नहीं
फिर भी हमको यकीन नहीं।
 
झुकता सर सजदे में अब नहीं
कंधों पर अपने फिरते, आरजू कुछ नहीं।
 
आयेंगे अभी, पर लौटे अब नहीं
भरोसा रखते सब पर ऐतबार अब नहीं।

अपने - अपने

हर शहर की
अपनी ही गलियाँ-
घरों के बीच से गुजरती
गुम हो जाती जंगलों में।

हर नदी के 
अपने ही जंगल
पहाड़ों स ढलते हुए
खो जाते सागर किनारे।

हर सागर की
अपनी ही लहरें
उमड़ती घुमड़ती गोद से उठती
ओझल हो जाती बादलों बीच।

हर आसमान के
अपने ही बादल
हवाओं के परों पर लरजते
बिजली से 
शहरों पर बिखर जाते

स्याह साए

कठपुतली से चलते देखा मैंने
कदम से कदम मिलाते
कोई आहट नहीं 
सन्नाटे में और सन्नाटा घोलते।
रौशनी के छिपते ही
लिपट गए मुझसे
स्याह साए-
धीरे धीरे साँसों में घुलते 
और रग रग में मेरे रम रहे।

चिंगारियाँ रुक रुक कर उठतीं
तराशती इन्हें
पर रंगों को चुरा
फिर छिप जाते अंधेरों में।

सूरज चाँद तारों के  इर्द गिर्द
मंडराते फिरते रहते
आकाशगंगा से थिरकते
क्षितिज के इस छोर से उस छोर तक।

दीवारों, रौशनदान से रिसते
चिमनियों से उतरते
दरवाजे, खिड़कीयों तक अधिकार जमा रखा
बिखरे हुए अब हर कोने में।

नींव

रोज कहाँ जा पाता हूँ -
इस घर के  हर कमरे में ?
थका हारा, काम से चूर
शाम के  वक़्त तक,
बस नहाने भर की -
बची रहती है ताक़त।
फिर भोजन और टीवी-
रोज ही होता ऐसा।

जुटा लिया सामान मैंने-
सजा दिया हर कोने में....
कहाँ उपभोग कर पाता हूँ ,
जीवन की इस आपा धापी में ?
कभी टीवी देखते समय ,
तो कभी खाने के वक़्त-
बच्चे राग अपना अलापते,
स्कूल के , दोस्तों के , फरमाईशों के  ।
सुन अनसुनी सा कर देता ,
तो झुंझला से जाते ।
कहाँ वक़्त दे पाता हूँ
उनके  खिलखिलाते सपनों को ?

इस मशीनीकरण के  युग में
सब कुछ यंत्रचालित सा घूम रहा।
रिश्तों की लड़ी, नाज़ुक मोड़ पर।
ना मुझे कोई समझ  रहा ,
ना मैं समझा पा रहा।
वक़्त ही कहाँ रहा
पाटने रिश्तों की दरार को ?

पर एक अद्दृश्य हाथ
सब कुछ संभाले जा रहा।
कमरे सारे बुहारता,
साजो सामान यथावत रखता, और
बचपन से - कड़ी मेरी संजोये रखता ।
अपार शक्ति से भरपूर -
स्पर्श जिसका पाकर ,
नवस्फूर्ती मचलती,
नित नवकलेवर मेरा,
होता थके  हारे शरीर में।
फिर भी हरकोई इसे,
देख कर भी अनदेखा -
किये जा रहा ?
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पत्थर की मूरत

पत्थर सा बन, बस गया
अंदर मन के मेरे।
जितना भी तराशा बस हल्की सी परत एक
छलनी हो रह गयी।
पर भीतर- अब तक
रहा अछूता सबसे।
मूरत सा-नज़र आता सबको
कोई छू कर-परे हो जाता
तो कोई दूर से - निहोरता
गर्भगृह में मेरे
बसी एक स्पंदन
घुट कर रह जाती 
भीतर ही कहीं भीतर।
सूरज, चाँद तारों की रोशनी
गर्मी, ठण्ड हो या नमी बारिश की
कुछ भी नहीं, करती विचलित इसे
अपने में ही निर्लिप्त
सबसे मुक्त, उन्मुक्त
पत्थर सा बन, बस गया
अंदर - मन के मेरे।

सन्नाटा

टूट गया नाता
सदियों निभाया जिसे हमने।

चीर सीना धरती का
लहलहाते नहीं अब खेत,
मचल-मचल कर नदियाँ
सींचती नहीं कोई धरती,
कोई लपट उठती नहीं
दूर दराज पहाड़ों पर,
कोई आवाज गूंजती नहीं
उजड़े हुए जंगलों से।
 
हर तरफ एक सन्नाटा
गूँज रहा बेताल नागरी में,
हर तरफ गहराता धूंआ बदली बन
टपक रहा हर एक छत से।
वीरान हो गए कच्चे घर
सूनी गलियां तरस रहीं
पनिहारनों की चाल।
अब तो शाम शहर बस 
गहराता जाता सन्नाटा
बस रह रह कर गूँज जाती कोयल की चहक
देख संपोलों की सरसराहट।

कैद में उसके

जाने कैसे सफर में,वह
एक बार जो गुज़रा-सदियों पहले
लौटा नहीं अब तक।
इसी कुँए से-बुझाई प्यास अपनी
प्रतिबिंब अपना -बना मुझे
तकता रहा-देर तक थिरकते पानी में
कैद हो रह गया मैं 
अर्धविकसित, अक्षम अशक्त।
 परत दर परत बढ़ते पानी संग
बढ़ता रहा धीरे धीरे मैं।
कभी तरंगों सा मचल उठता
तो कभी आसमान सा शांत।
जाने वाला जाने कब
लौटे इस और।

जाने परछाईयाँ कितनी उसकी
गुजर जा रही हवाओं पर।
जिधर भी दौड़ाऊँ नज़र अपनी
सब प्रतिबिंब से क़ैद उसके।
कहीं रिस रहा समय - सुईयों की टिकटिक से
कहीं झर रहा सागर अनंत - बादल की बूंदों से
पर बिखर रहा इंद्रधनुष
सूरज की किरणों से।

बस वही एक - सफर में
मगन, उन्मुक्त, निर्लिप्त।
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जाने कब बने?



जाने कब बने?

अब तो याद भी नहीं
किसने खरीदी यह जमीन
कब खोदी यह नींव?
बस जुनून भर रहा सब में
घर एक बनाने का।

बीत गये मौसम जाने कितने
रहते इस झोंपड़ी तले।
जहाँ तक नज़र दौड़ाउँ
बस झोंपड़े ही झोंपड़े
साथ कुच टूटी फ़ूटी दीवारें
जिनके इर्द गिर्द
बिखर रहीं कुछ गलियाँ।

दीवार एक चढती दिन में
तो सुबह ढही मिलती।
कभी अपने ढहा देते
तो कभी कोई अजनबी।
चूने, ईंटे गारे- समय के साथ
बहे मिले जा रहे माटी में।
उड़ जाते पन्ने किताबों के
दरारे गहराती जाती तराशे पत्थरों मे।

रोज सुबह एक नयी आस
रोज शाम एक नया सपना
देखता रहता- दुबक झोंपड़ी में अपनी
घर यह जाने कब तक बने।
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घर कब बनेगा?

जमीं तो पूर्वजों ने मेरे
कब से खरीद रखी
नींव एक बनाने का जुनून
सब में सदियों रहा।
ईंट, गारा, चूना- सब आता
दीवार एक खड़ी होने से पहले
जुट जाते छत की तैयारी में।
ढह जाती दीवार- समय के साथ
शुरु होता सिलसिला- फ़िर से
नींव पर घर बनाने का।

जाने कितने मिल गये मिट्टी में
इन्हीं ईंट, चूने गारों के साथ।
सड़ गल गयी लकड़ियाँ
जंग लग बरबाद हुये-लोहे के सरिये
पर कोई नामोंनिशान नहीं-
इस घर के बनने में।

दुबका मैं- अपनी ही ही झोंपड़ी में
बिता रहा समय अपना
गुजर जाते मौसम
धूप, बारिश और ठंड।
गुजारे हैं इसी झोंपड़े में
मौसम जाने कितने।
देखे हैं मैंने, पूर्वजों के संग
ढहती दीवारें, माटी होती मेहनत
उड़ते पन्ने किताबों से
धीरे-धीरे बहते अक्षर
गहराती दरारें तराशे पत्थरों से।

बचपन हमने गुजारा
रेत के टीलों पर उछलते
ईंटों के पीछे लुक्का छिप्पी करते।
कभी रेत उड़ाते एक दूसरे पर
तो कभी फ़ेंकते ईंट पत्थर
कोई रोता-आँखों की धूल पर
तो कोई कराहाता-पत्थरों की चोट पर।

जाने गुजर गया- समय कितना
बस गलियाँ ही गलियाँ
बिखरी हुई झोंपड़ियों के इर्द गिर्द
सब दुबक जाते इन्हीं में
सांझ के सर उठाने पर।

इस नींव पर बनेगा एक घर नया
रंगीन होंगी दीवारें इसकी
जिनपर टंगी होंगी
तस्वीरें पूर्वजों की।
पूजा होगी, आजान होगी घरों में
झूलेंगी झिलमिलाती लड़ियाँ
दीवाली, ईद किसमस पर।
रंगीन होंगी, गलियाँ
होली के रंगों पर।

पर यह घर - कब बनेगा ?
रोज यही सोचता रहता
मैं झोंपड़ी की छत से
देखता जब भी सितारों को।
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Wednesday, July 16, 2014

some lines


काँटों से गुज़र जाना, शोलों से निकल जाना,
जब फूलों की बस्ती आए तो संभल कर जाना।

दिन अपने चिराग़ों से कुछ इस तरह जलते हैं,
हर सुबह को बुझ जाना, हर शाम को जल जाना।

बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी
एक मुद्दत से हमें उसने सताया भी नहीं


1. आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक?

बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी
एक मुद्दत से हमें उसने सताया भी नहीं


2. दाम हर मौज में है हल्का-ए-सद-काम-ए-नाहंग,
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक।

[दाम = जाल/फँदा, मौज = लहर, हल्का = घेरा, सद = सौ, नाहंग = मगरमच्छ, सद-काम-ए-नाहंग = सौ जबड़ों वाला मगरमच्छ, गुहर = मोती]


3. आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक?

[सब्र = धैर्य, तलब = चाह/खोज]


4. हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे, लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुमको ख़बर होने तक।

[तग़ाफ़ुल = उपेक्षा/अनदेखी]


5. परतव-ए-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की तालीम,
मैं भी हूँ इक इनायत की नज़र होने तक।

[परतव-ए-ख़ुर = सूरज की किरण/प्रतिबिंब, शबनम = ओस, फ़ना = नश्वरता/मिट जाना, इनायत = कृपा]


6. यक-नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल,
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर होने तक।

[बेश = बहुत, फ़ुर्सत-ए-हस्ती = जीवन का समय, ग़ाफ़िल = बेख़बर, रक़्स = नृत्य, शरर = चिंगारी]

7. ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किससे हो जुज़ मर्ग इलाज,
शम्मा हर रंग में जलती है सहर होने तक।

[हस्ती = जीवन/अस्तित्व, जुज़ = सिवाय/के अलावा, मर्ग = मृत्यु, सहर = सुबह]


तमाम उम्र उसी के ख़याल में गुज़री ‘फ़राज़’,
मेरा ख़याल जिसे उम्र भर नहीं आया।


ये दिन भी क़यामत की तरह गुज़रा है ‘फ़राज़’,
जाने क्या बात थी हर बात पे रोना आया।


बस वो शख़्स अच्छा लगा, उसे साफ़ कह डाला हमने ‘फ़राज़’,
दिल की बात है, हमसे मुनाफ़िक़त न हो सकी।


एक ख़लिश अब भी मुझे बेचैन करती है ‘फ़राज़’,
सुन के मेरी मरने की ख़बर वो रोया क्यों था।


बहुत अजीब हैं ये बंदिशें मोहब्बत की ‘फ़राज़’,
न उसने क़ैद में रखा, न हम फ़रार हुए।


कुछ इस तरह नज़रअंदाज़ हो गए ‘फ़राज़’,
जैसे इज़ाफ़ी हर्फ़ थे तेरी ज़िंदगी की किताब में।


तुझ से बिछड़ के बचपन का ये भेद खुला,
क्यों लिखता था मैं पैरों पे “तन्हा तन्हा”।


कोई नहीं है मेरे जैसा चारों ओर,
अपने गिर्द एक भीड़ सजा के “तन्हा” हूँ।


प्यार में इक ही मौसम है बहारों का ‘फ़राज़’,
लोग कैसे मौसमों की तरह बदल जाते हैं।


जब ख़िज़ां आएगी तो लौट आएगा वो भी ‘फ़राज़’,
वो बहारों में ज़रा कम ही निकला करता है।

-जिस को भी चाहा उसे शिद्दत से चाहा है ‘फ़राज़’,

सिलसिला टूटा नहीं दर्द की ज़ंजीर का।


आज दिल खोल के रोए हैं तो यूँ खुश हैं ‘फ़राज़’,
चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे।


हिज्र की रात बहुत लंबी है ‘फ़राज़’,
आओ उसकी याद में थक के सो जाएँ।


कुछ तू ही मेरे दर्द का मफ़हूम समझ ले ‘फ़राज़’,
हँसता हुआ चेहरा तो ज़माने के लिए है।


तुम ताल्लुक तोड़ने का कहीं ज़िक्र न करना ‘फ़राज़’,
मैं लोगों से कह दूँगा कि उसे फ़ुर्सत नहीं मिलती।


ज़लज़ले यूँ ही बे-सबब नहीं आते ‘फ़राज़’,
कोई दीवाना तह-ए-ख़ाक तड़पता होगा।


मैंने जिस शाख़ को फूलों से सजाया था ‘फ़राज़’,
मेरे सीने में उसी शाख़ का काँटा उतरा।


हम न बदलेंगे वक़्त की रफ़्तार के साथ ‘फ़राज़’,
हम जब भी मिलेंगे अंदाज़ पुराना होगा।


बड़ा अँधेरा था उनकी राहों में ऐ दिल ‘फ़राज़’,
मैं अपना घर न जलाता तो और क्या करता।


हमने महबूब जो बदला तो तअज्जुब कैसा ‘फ़राज़’,
लोग काफ़िर से मुसलमान भी तो हो जाते हैं।


वो भी रो देगा उसे हाल सुनाएँ कैसे,
मोम का घर है चिरागों को जलाएँ कैसे।


दूर होता तो उसे ढूँढ भी लेते ‘फ़राज़’,
रूह में छुप के जो बैठा है उसे पाएँ कैसे।


मैंने तो अपनी तन्हाइयों से तंग आकर दोस्त बनाए थे ‘फ़राज़’,
दोस्त भी ऐसे मिले कि मुझे और तन्हा कर गए।


मुझे ग़ुरूब न जानो जो मैं उफ़क़ पे नहीं ‘फ़राज़’,
बिखर गया हूँ अँधेरों में कहकशाँ की तरह।


बहाना क्यों तराशा रूठ जाने का ‘फ़राज़’,
बस इतना कह देते कि दिल में जगह नहीं रही।


पहले तराशा उसने मेरा वजूद शीशे से ‘फ़राज़’,
फिर ज़माने भर के हाथों में पत्थर थमा दिए।


पानी में अक्स देख कर खुश हो रहा था ‘फ़राज़’,
पत्थर किसी ने मार कर मंज़र बदल दिया।


ऐ इंसान, इब्न-ए-आदम से नंगा आया है तू ‘फ़राज़’,
कितना सफ़र किया है तूने दो गज़ कफ़न के लिए।


अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे ‘फ़राज़’,
क्यों तन्हा से हो गए हैं तेरे जाने के बाद।


एक ही ज़ख़्म नहीं, सारा बदन ज़ख़्मी है ‘फ़राज़’,
दर्द हैरान है कि उठूँ तो कहाँ से उठूँ।


सब रौशनियाँ मुझसे रूठ गईं ये कह कर ‘फ़राज़’,
तुम अपने चिरागों की हिफ़ाज़त नहीं करते।


तमाम उम्र मुझे टूटना बिखरना था ‘फ़राज़’,
वो मेहरबान भी कहाँ तक समेटता मुझे।


लोग कहते हैं कि मुलाक़ात नहीं हुई ‘फ़राज़’,
हम तो रोज़ मिलते हैं लेकिन बात नहीं होती।


मैं जो महका तो मेरी शाख़ जला दी उसने ‘फ़राज़’,
सब्ज़ मौसम में मुझे ज़र्द हवा दी उसने।


टूट कर चुभ रहा है आँखों में ‘फ़राज़’,
आईना तो नहीं था ख़्वाब मेरा।


दाग़ दामन के हों, दिल के हों या चेहरे के ‘फ़राज़’,
कुछ निशान उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं।


इश्क़ की राह में दो ही मंज़िलें ‘फ़राज़’,
या दिल में उतर जाना, या दिल से उतर जाना।


आँख मसरूफ़-ए-नज़ारा थी तो हम खुश थे ‘फ़राज़’,
तुमने क्या ज़ुल्म किया दिल में ठिकाना कर के।


तेरे ख़ुलूस ने बर्बाद कर दिया है ‘फ़राज़’,
फ़रेब देते तो कब के संभल गए होते।


तुम से बिछड़ कर ज़ेहन ऐसा हुआ मुंतशिर ‘फ़राज़’,
कि लोगों से अपने घर का पता पूछना पड़ा।


ज़माने के सवालों को मैं हँस के टाल दूँ ‘फ़राज़’,
लेकिन नमी आँखों की कहती है “मुझे तुम याद आते हो।”


ये दिन भी क़यामत की तरह गुज़रा है ‘फ़राज़’,

जाने क्या बात थी हर बात पे रोना आया।


बस वो शख़्स अच्छा लगा, उसे साफ़ कह डाला हमने ‘फ़राज़’,
दिल की बात है, हमसे मुनाफ़िक़त न हो सकी।


एक ख़लिश अब भी मुझे बेचैन करती है ‘फ़राज़’,
सुन के मेरी मरने की ख़बर वो रोया क्यों था।


बहुत अजीब हैं ये बंदिशें मोहब्बत की ‘फ़राज़’,
न उसने क़ैद में रखा, न हम फ़रार हुए।


कुछ इस तरह नज़रअंदाज़ हो गए ‘फ़राज़’,
जैसे इज़ाफ़ी हर्फ़ थे तेरी ज़िंदगी की किताब में।


तुझ से बिछड़ के बचपन का ये भेद खुला,
क्यों लिखता था मैं पैरों पे “तन्हा तन्हा”।


कोई नहीं है मेरे जैसा चारों ओर,
अपने गिर्द एक भीड़ सजा के “तन्हा” हूँ।


प्यार में इक ही मौसम है बहारों का ‘फ़राज़’,
लोग कैसे मौसमों की तरह बदल जाते हैं।


जब ख़िज़ां आएगी तो लौट आएगा वो भी ‘फ़राज़’,
वो बहारों में ज़रा कम ही निकला करता है।

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जिस को भी चाहा उसे शिद्दत से चाहा है ‘फ़राज़’,
सिलसिला टूटा नहीं दर्द की ज़ंजीर का।


आज दिल खोल के रोए हैं तो यूँ खुश हैं ‘फ़राज़’,
चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे।


हिज्र की रात बहुत लंबी है ‘फ़राज़’,
आओ उसकी याद में थक के सो जाएँ।


कुछ तू ही मेरे दर्द का मफ़हूम समझ ले ‘फ़राज़’,
हँसता हुआ चेहरा तो ज़माने के लिए है।


तुम ताल्लुक तोड़ने का कहीं ज़िक्र न करना ‘फ़राज़’,
मैं लोगों से कह दूँगा कि उसे फ़ुर्सत नहीं मिलती।


ज़लज़ले यूँ ही बे-सबब नहीं आते ‘फ़राज़’,
कोई दीवाना तह-ए-ख़ाक तड़पता होगा।


मैंने जिस शाख़ को फूलों से सजाया था ‘फ़राज़’,
मेरे सीने में उसी शाख़ का काँटा उतरा।


हम न बदलेंगे वक़्त की रफ़्तार के साथ ‘फ़राज़’,
हम जब भी मिलेंगे अंदाज़ पुराना होगा।


बड़ा अँधेरा था उनकी राहों में ऐ दिल ‘फ़राज़’,
मैं अपना घर न जलाता तो और क्या करता।


हमने महबूब जो बदला तो तअज्जुब कैसा ‘फ़राज़’,
लोग काफ़िर से मुसलमान भी तो हो जाते हैं।


वो भी रो देगा उसे हाल सुनाएँ कैसे,
मोम का घर है चिरागों को जलाएँ कैसे।
दूर होता तो उसे ढूँढ भी लेते ‘फ़राज़’,
रूह में छुप के जो बैठा है उसे पाएँ कैसे।


मैंने तो अपनी तन्हाइयों से तंग आकर दोस्त बनाए थे ‘फ़राज़’,
दोस्त भी ऐसे मिले कि मुझे और तन्हा कर गए।

-मुझे ग़ुरूब न जानो जो मैं उफ़क़ पे नहीं ‘फ़राज़’,

बिखर गया हूँ अँधेरों में कहकशाँ की तरह।


बहाना क्यों तराशा रूठ जाने का ‘फ़राज़’,
बस इतना कह देते कि दिल में जगह नहीं रही।


कब मुझ को ऐतिराफ़-ए-मुहब्बत न था ‘फ़राज़’,
कब मैंने ये कहा था सज़ाएँ मुझे न दो।


पहले तराशा उसने मेरा वजूद शीशे से ‘फ़राज़’,
फिर ज़माने भर के हाथों में पत्थर थमा दिए।


हम सुना रहे थे अपनी बेवफ़ाई का क़िस्सा ‘फ़राज़’,
अफ़सोस इस बात का—औरों ने तो वाह-वाह की, उन्होंने भी वाह-वाह की।


पानी में अक्स देख कर खुश हो रहा था ‘फ़राज़’,
पत्थर किसी ने मार कर मंज़र बदल दिया।


ऐ इंसान, इब्न-ए-आदम से नंगा आया है तू ‘फ़राज़’,
कितना सफ़र किया है तूने दो गज़ कफ़न के लिए।


अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे ‘फ़राज़’,
क्यों तन्हा से हो गए हैं तेरे जाने के बाद।


एक ही ज़ख़्म नहीं, सारा बदन ज़ख़्मी है ‘फ़राज़’,
दर्द हैरान है कि उठूँ तो कहाँ से उठूँ।


सब रौशनियाँ मुझसे रूठ गईं ये कह कर ‘फ़राज़’,
तुम अपने चिरागों की हिफ़ाज़त नहीं करते।

-तमाम उम्र मुझे टूटना बिखरना था ‘फ़राज़’,

वो मेहरबान भी कहाँ तक समेटता मुझे।


लोग कहते हैं कि मुलाक़ात नहीं हुई ‘फ़राज़’,
हम तो रोज़ मिलते हैं लेकिन बात नहीं होती।


मैं जो महका तो मेरी शाख़ जला दी उसने ‘फ़राज़’,
सब्ज़ मौसम में मुझे ज़र्द हवा दी उसने।


टूट कर चुभ रहा है आँखों में ‘फ़राज़’,
आईना तो नहीं था ख़्वाब मेरा।


तुम्हारी दुनिया में हम जैसे हज़ारों हैं ‘फ़राज़’,
हम ही पागल थे जो तुम्हें पा कर इतराने लगे।


दाग़ दामन के हों, दिल के हों या चेहरे के ‘फ़राज़’,
कुछ निशान उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं।


इश्क़ की राह में दो ही मंज़िलें ‘फ़राज़’,
या दिल में उतर जाना, या दिल से उतर जाना।


आँख मसरूफ़-ए-नज़ारा थी तो हम खुश थे ‘फ़राज़’,
तुमने क्या ज़ुल्म किया दिल में ठिकाना कर के।


तेरे ख़ुलूस ने बर्बाद कर दिया है ‘फ़राज़’,
फ़रेब देते तो कब के संभल गए होते।

तुम्हारी दुनिया में हम जैसे हज़ारों हैं ‘फ़राज़’,
हम ही पागल थे जो तुम्हें पा कर इतराने लगे।


दाग़ दामन के हों, दिल के हों या चेहरे के ‘फ़राज़’,
कुछ निशान उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं।


इश्क़ की राह में दो ही मंज़िलें ‘फ़राज़’,
या दिल में उतर जाना, या दिल से उतर जाना।


आँख मसरूफ़-ए-नज़ारा थी तो हम खुश थे ‘फ़राज़’,
तुमने क्या ज़ुल्म किया दिल में ठिकाना कर के।


तेरे ख़ुलूस ने बर्बाद कर दिया है ‘फ़राज़’,
फ़रेब देते तो कब के संभल गए होते।


बशीर साहिब- चुनिन्दा शायरी

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फ़ासले से मिला करो।

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा,
इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जायेगा।

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जायेगा।

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों।

एक दिन तुझ से मिलने जरूर आऊंगा
जिंदगी मुझ को तेरा पता चाहिए।

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।

पलकें भी चमक जाती हैं सोते में हमारी,
आंखों को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते।

तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था,
फिर उस के बाद मुझे कोई अजनबी नहीं मिला।

जिस पर हमारी आंख ने मोती बिछाये रात भर
भेजा वही क़ाग़ज उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं।

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता।

जैसे सर्दियों में गर्म कपड़े दे फ़क़ीरों को,
लबों पे मुस्कुराहट थी मगर कैसी हिकारत सी।

अजीब शख्स है नारा होके हंसता है,
मैं चाहता हूं ख़फ़ा हो, तो ख़फ़ा ही लगे।

देने वाले ने दिया सब कुछ अजब अंदाज से,
सामने दुनिया पड़ी है और उठा सकते नहीं।

मिल भी जाते हैं तो कतरा के निकल जाते हैं,
हाय मौसम की तरह दोस्त बदल जाते हैं।

हम अभी तक हैं गिरफ़्तार-ए-मुहब्बत यारों,
ठोकरें खा के सुना था कि सम्भल जाते हैं।

मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो,
मेरी तरह तुम भी झूठे हो।

कभी हम भी इस के क़रीब थे, दिलो जान से बढ़ कर अज़ीज थे,
मगर आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला ना हो।

कभी धूप दे, कभी बदलियां, दिलोजान से दोनों कुबूल हैं,
मगर उस नगर में ना कैद कर, जहां जिन्दगी की हवा ना हो।

Wednesday, June 25, 2014

शाम सवेरे

यह शाम
सुहानी कितनी लग रही।
बहने लगी फिर से-
मंद सुगंध हवा और साथ
चहचहाने लगीं चिड़ियाँ।
रंग क्षितिज पर इन्द्रधनुषी सा
बिखर पास अपने बुला रहा।

थकान दिन भर की,
पसीने दुपहरी के
सब घुल मिल - सिरहन सी दौड़ा रहे।
बस पानी देना रहा बाकी
कहते फूल बगिया के मेरे।

हौले-हौले तन जायेगी
चादर काली रात की।
जगमगा उठेंगे जुगनूओं से
टिमटिमाते चाँद तारे।
फिर ढल रात, निखरेगी
एक नए  सवेरे में।

सोचता हूँ-सुस्ता लूं थोड़ा
एक नए दिन के लिए
जो आयेगा उम्मीदें नयी लिए।
पर फर्क कहाँ नजर कोई आया
शाम हो या सवेरा
एक ढलता तो दूजा चढ़ता
मेरे इस सफर में।
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रूढीयाँ



सारे घर में घूमती रहती
निःसंकोच, निर्भय;
पैरों में बंधे घुंघरू,
बजते रहते-छन, छन, छन।
एक पल भी बैठती नहीं
पास मेरे चैन से-
बीच कदमों से निकल भागती।
खाना दो तो-कतरा जाती,
जाने कुछ ढूंढ रही, घर में मेरे
बस घूमती ही रहती बेचैन सी
छन, छन, छन।

अनायास ही कूद खिड़की
जाने कहाँ चली जाती। 
धीरे-धीरे आवाज़ घुंघरूओं की
कमजोर पड़ने लगती-
बस दूर तक-देखता उसे मैं
ओझल होते लाल-पीले फूलों से
दूर लहलहाती झाड़ियों की ओट से।
काले, भूरे चितकबरे रंगों की
सफ़ेद स्याह, वह बिल्ली।

फिर अचानक चौंक कर
उठ पड़ता- गहरे स्वप्न से
देखता पास खड़ी
घूरती-लाल  लाल आँखों से
अजीब सी, डरावनी-
पर भोली-भाली, प्यारी बिल्ली।
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25 जून 2014

Tuesday, June 24, 2014

तबाही

पहाड़ों पर बारिश-
इतनी तो हुई ही नहीं ।
फिर नदी यह
उफन रही - क्यों इतनी?

तोड़ किनारे अपने सब
रास्तों को लगी बहाने,
ढहाने लगी दीवारें घरों की
डुबो रही खेत खलिहान।

कहते हैं- सदियों पहले
उठे थे लपलपाते शोले
इन पहाड़ों पर बसे जंगलों से।
काले भयावह धुंए ने
 ढांप दिये सूरज चाँद।
चारों तरफ फ़ैल गयी चादर अंधियारी
ना कुछ दिखता, ना ही सूझता।
कुछ झुलस स्वाहा हुए
और कुछ घुट बदहवास।

लगता है- धूंआ वही अब
बादल बन बरस रहा।
वरना नीयत ही नहीं -
नदी की किनारे तोड़ने की।
ना ही नीयति गावों की
देर सबेर बह जाने की।
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24-06-14

Tuesday, June 17, 2014

लोग तो -

लोग तो हाथ दोनों उठाकर भी, झूठ सफ़ेद बोल देते हैं,
तुम एक हाथ उठा देख, किस सच की उम्मीद लगाए बैठे हो।

लोग तो गले मिल कर भी, ज़ख्म गहरा दिल पर लगा देते हैं,
तुम सर झुका देख उनका, किस वफ़ा की तलाश में बैठे हो ।

लोग तो कहकहों से, आँसू हज़ार दामन में बिखेर देते हैं,
तुम हल्की सी मुस्कान पर किसकी, दुनिया अपनी लुटाये बैठे हो ।

लोग तो मौका मिलते ही, याराना सदियों का भुला बैठते हैं
तुम पल पल याद कर, कोशिश में किसे भूलाने बैठे हो ।

उसके लिए-

वो जानता - कहाँ सजाना मुझे
शब्द एक मैं उसके लिये -
नित नए भावों में सजा मुझे
कविता अपनी निखार रहा ।

तलाश कर रहा वह - एक नयी धुन
स्वर एक मैं, उसके  लिये -
साज पर अपने तरंगों में सजा
कविता में प्राण नए फूंक रहा ।

देखा है मैंने उसे - खींचते आड़ी तिरछी रेखाएं
रंग एक मैं,  उसके लिए -
तूली पर अपनी सजा
सपनों को आकार इन्द्रधनुषी दे रहा ।

लहरों सा बार बार भेजता मुझे
कभी सीपी देकर, तो कभी मोती
सब कुछ किनारे धर बेकल सा मैं 
बार बार लौट - समा जाता उसमें ।

हाय री किस्मत-

बोल पर मेरे मत जाओ
अचानक मिले जो तुम,
चौंका दिया मुझे
आज पहली बार।

रोता बिलखता छोड़
जाने कहाँ गुम हो गए - निर्मोही ।
आज साथ ले जाने को
इतने क्यों तत्पर ?

जाने गिले - शिकवे कितने,
कितने किस्से अधूरे- कहने तुमसे ।
कहाँ-कहाँ भटकता, ढूँढता
नहीं फिरा मैं।
कोई पता भी ना दिया
पूछूं  तो किससे पूछूं  ।
ना मुझे कोई यहाँ जानता,
ना तुम्हें कोई पहचानता,
कहो - कहाँ ओझल हो गए तुम?

मनमीत मेरे-
मैं ही जानता - कटे कैसे मेरे दिन रात।
वो निश्छल चेहरा तुम्हारा, वो कोमल स्पर्श
वो मीठे बोल , वो सपने सुहाने
समय की धार पर - सब धुलते गए।
जाने कितनों से मिला और कितनों से बिछड़ा
कितना संजोया, और लुटाया
कभी मुस्कुराता तो कभी पोंछता आँसू
जहां भी रहा - एक टीस सी रही
मन के अन्दर
और मन के  कोने में
इंतज़ार तुम्हारा।

आंसूओं पर मेरे मत जाओ
मुझे ही नहीं मालूम
घुले हैं इनमें ना जाने
कितने खुशी और कितने गम।
देख तुम्हें आज अचानक यहाँ
इतराऊँ  या कोसूं किस्मत अपनी?
साथ अपने ले चलने का
कर रहे हो वादा या
फिर किसी और मेले में
छोड़ बिलखता-
ओझल होने का तो
नहीं कोई इरादा?
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अधूरा स्वप्न

एक अधूरा स्वप्न, हो तुम.
साथ साथ मेरे - फिर भी 
रोम रोम मेरे सिहर रहे.
मैं जहां भी रहूँ - जो भी करूं 
संग मेरे - रहते हो तुम.

अभी अभी  - जो छू कर गयी 
अभी अभी - जो छल कर गयी 
नित नए रंगों में ढल, आते - जाते 
पल पल नूतन - स्पर्श हो तुम. 

कोई मेरे आगे, कोई मेरे पीछे
भीड़ में मैं , मुझमें भीड़ 
कोई कहता कुछ , कोई सुनता कुछ
मन का मेरे शांत - कोलाहल हो तुम.  

ना मैं तुमसे अछूता , ना तुम मुझसे 
परे परे रहकर भी , एक दूसरे को निहोराते 
सब कुछ संजोया मेरा- बिखर सा जाता 
दर्पण में छिपा , एहसास मेरा हो तुम.
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जीवन कल

बार बार भेजता
सागर लहरों के रेले. 
किये थे जिन्होंने 
कभी पर्वतों को 
रेतीले टीले . 
अब सर धुनता सागर 
जब सोख लेते , 
हर लहर 
वही रेतीले टीले. 
परिसीमित कर दिया 
सागर का अहम्, 
समय के फेर ने.

काँप गया , 
तूफ़ान का जोर 
बिजली सी दौड़ा दी ,
आसमान में 
जब देखा 
हल्की सी हवा में 
टूटते पत्ते को 
मिट्टी बन , 
मजबूत करते जड़ों को. 

हर महाविनाश पर , 
बोया जा रहा 
बीज नया 
संचार होता नवजीवन 
रोक नहीं पाया कोई 
निर छल, निर्मल , 
पावन-पल पल 
समय की 
मद्धम धार
अविरत , 
अनंत और अगाध.
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महक
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महक मेरे मन की - 
अब तक छिपी हुई - 
सीप में मोती सी.
कभी निकलने को बेकल 
कभी डरी सहमी सी- 
गुमसुम. 
मुठ्ठी में क़ैद - 
एक जुगनू बिखेरता 
चमक अपनी. 
बेखबर क़ैद से-
अनजान दिन से . 
जाने कहाँ तक 
फैले खुशबू.
जाने कब तक 
रहे चमक. 
ना रोके रुकती खुशबू 
ना बांधे बंधती चमक. 
कोई होड़ नहीं खुशबूओं में 
मदमस्त बहती  
तरंगों पर हवाओं 
के साथ छिप जाती 
कलि में फिर
फूल से बिखरती . 
चमक चमकती पेड़ों पर 
अनजान अपनी ही 
पहचान से. 
महक मेरे मन की 
बेकल-छिपी हुई... 
बेकल बिखरने को ..

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गुलदस्ता

गुलदस्ते में सजे फूल
काट-छांट कर सजाये हुए।
कट गयी हैं जड़ें किसी की
तो कट गयी- शाख, पत्ती किसी की।
खुशबू से सरोकार नहीं किसीको
सब हैं रंगों को देख बेकाबू।

कभी नहाते थे फूल यही- 
रौशनी सूरज चाँद की में
अब चुंधिया से जाते-
देख टिमटिमाती दुकान की रौशनी।
आंधी, तूफ़ान, बिजली-
देख कभी ना ये लरजे।
अब काँप से जाते-
देख मंडराते भौंरे, तितली।
कोइ सिहर सा जाते, कोई लजा सा जाता 
पाकर हल्का सा स्पर्श।
जाने कौन देश इनका
जाने कौन सी मिट्टी पानी-
रंग बिखेरते सब,
सजे यहाँ - एक गुलदस्ते में।

खाना - पीना मिलता,  मुस्कुराने भर को
इजाजत नहीं मुरझाने की।
बाजार भरा खरीददारों से,
नीलामी कहीं, तो कहीं होते मोलभाव।
मतलब निकल जाने भर का इन्तजार
खरीददारों को- गुलदस्ते से।
फिर फेंक देते सजाने- ढेर कचरे के।

क्यों सिहर जाता मैं- क्यों मुस्कुराते तुम
देख दुकान पर- रंग बिरंगा गुलदस्ता।
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सुलगती जिन्दगी...

मन के ख्यालों से
उठता है धुँआ-
सब कुछ कर देता धूमिल।
सूझने समझने की कोशिशे
घुट सी जाती।

इसी धूएँ की परत दर परत ऊपर
बिखरे हैं बादल सपनों के-
उजले सफ़ेद जगमगाते से दिखते
जब भी किरण आशा की
छन कर आती इनसे।

बरसेंगे बादल, यकीन है मुझे-
चल रही मंद सुगंध
मेरी चाहत की हवा।
छट जाएगा धुँआ
दूर हो जायेगी बेचैन घुटन।

थोड़ा सा इन्तजार,
थोड़ा सा सब्र
भर रहा हूँ साँसों से
अपने इस-सुलगते जीवन में।
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09जून 14

Monday, February 24, 2014

मुसाफिर

परियों के देश से
जब भी आता वह-
पिश्ते, बादाम, खजूर के साथ
कथा परियों की सुनाता जाता।

आजकल बड़ा उदास रहता वह
पूछो तो -
मुठ्ठी भर रेत उड़ाता और
रूह तक मेरी
रुला जाता वह।
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14 Feb 14

Friday, February 14, 2014

सपने

परियों के देश से
जब भी आता वह-
पिश्ते, बादाम, खजूर के साथ
कथा परियों की सुनाता जाता।

आजकल बड़ा उदास रहता वह
पूछो तो - रूह तक मेरी
रुला जाता वह।
-----------
14 Feb 14

Thursday, February 13, 2014

मनमीत

हाय री किस्मत-

बोल पर मेरे मत जाओ 
अचानक मिले जो तुम,
चौंका दिया मुझे
आज पहली बार।

रोता बिलखता छोड़ 
जाने कहाँ गुम हो गए - निर्मोही ।
आज साथ ले जाने को
इतने क्यों तत्पर ?

जाने गिले - शिकवे कितने,
कितने किस्से अधूरे- कहने तुमसे ।
कहाँ-कहाँ भटकता, ढूँढता
नहीं फिरा मैं।
कोई पता भी ना दिया
पूछूं  तो किससे पूछूं  ।
ना मुझे कोई यहाँ जानता,
ना तुम्हें कोई पहचानता,
कहो - कहाँ ओझल हो गए तुम?

मनमीत मेरे-
मैं ही जानता - कटे कैसे मेरे दिन रात।
वो निश्छल चेहरा तुम्हारा, वो कोमल स्पर्श 
वो मीठे बोल , वो सपने सुहाने
समय की धार पर - सब धुलते गए।
जाने कितनों से मिला और कितनों से बिछड़ा
कितना संजोया, और लुटाया
कभी मुस्कुराता तो कभी पोंछता आँसू
जहां भी रहा - एक टीस सी रही 
मन के अन्दर
और मन के  कोने में
इंतज़ार तुम्हारा।

आंसूओं पर मेरे मत जाओ
मुझे ही नहीं मालूम
घुले हैं इनमें ना जाने 
कितने खुशी और कितने गम।
देख तुम्हें आज अचानक यहाँ
इतराऊँ  या कोसूं किस्मत अपनी?
साथ अपने ले चलने का
कर रहे हो वादा या
फिर किसी और मेले में
छोड़ बिलखता-
ओझल होने का तो 
नहीं कोई इरादा?
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12 Feb14