Friday, April 24, 2026

 Maths of life

1+1 = 2 गणित

1+1 = 11 संगठन
1+1 = 0 अध्यात्म
1+1 = virudh _ राजनीति
1+1 = 1 प्रेम
1+1 = मिलने ही ना दिया जाए _ कूटनीति

Shayaris


रिश्ते है इसलिए चुप है
चुप है इसलिए रिश्ते है।।

सर पर चढ़कर बोल रहे हैं, पौधे जैसे लोग,
पेड़ बने खामोश खड़े हैं, कैसे-कैसे लोग....

प्यार एक नशा है
जिसका पहले उतर गया
वो बेवफा है।।

 



 Slokas and Tulasi Ramayana

अपराजित नमस्ते अस्तु नमस्ते रामपूजित
प्रस्थानंच करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ||

' गं हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा ।।

नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय।
सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा

 

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति

Transliteration

dvā suparā sayujā sakhāyā samāna vkṣa pariṣasvajāte |
tayoranya pippala svādvattyanaśnannanyo abhicākaśīti ||

Anvaya

सयुजा सखाया द्वा सुपर्णा समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोः अन्यः पिप्पलं स्वादु अत्ति। अन्यः तु अनश्नन् अभिचाकशीति

Anvaya Transliteration

sayujā sakhāyā dvā suparā samāna vkṣa pariṣasvajāte| tayo anya pippala svādu atti| anya ( tu ) anaśnan abhicākaśīti ||

Meaning

Two birds, beautiful of wing, close companions, cling to one common tree: of the two one eats the sweet fruit of the tree, the other eats not but watches his fellow.

Hindi Meaning

दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी, घनिष्ठ सखा, समान वृक्ष पर ही रहते हैं; उनमें से एक वृक्ष के स्वादिष्ट फलों को खाता है, अन्य खाता नहीं अपितु अपने सखा को देखता है।

Glossary

सयुजा सखाया - sayujā sakhāyā - close companions | द्वा सुपर्णा - dvā suparā - two birds, beautiful of wing | समानम् वृक्षम् - samānam vkṣam - one common tree | परिषस्वजाते - pariṣasvajāte - clinging to | तयोः - tayo - of the two | अन्यः - anya - one | स्वादु पिप्पलम् - svādu pippalam - the sweet fruit of the tree | अत्ति - atti - eats | अन्यः - anya - the other | अनश्नन् - anaśnan - eats not | अभिचाकशीति - abhicākaśīti - but watches his fellow |
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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।

साजि चतुरंग-सैन अंग में उमंग धारि,
सरजा सिवाजी जंग जीतने चलत है।
भूषन भनत नाद बिहद नगारन के,
नदीनद मद गैबरन के रलत है।
ऐलफल खैलभैल खलक में गैल-गैल,
गजन की तैलपैल सैल उसलत है।
तारा सौ तरनि धूरिधारा में लगत
जिमि थारा पर पारा पारावार यों हलत है।

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कठिन शब्दार्थ-साजि = सजाकर। चतुरंग सैन = हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक चार अंगों से युक्त सेना। अंग = शरीर। उमंग = उत्साह। धरि = धारण करके। सरजा = शिवाजी की उपाधि। जंग = युद्ध। भनत = कहते हैं। नाद= शब्द। बिहद = भारी, घोर। नगारन के = युद्ध के नगाड़ों के। नद = विशाल नदी। मद = मत्त हाथी की कनपटी से टपकने वाला द्रव। गैबरन = हाथियों। रलत है = बहते हैं। ऐल फैल = सेना के फैलने या चलने से। खैल-मैल = खलबली, भय। खलक = संसार। गैल-गैल = गली-गली या सभी मार्गों पर। गजन की = हाथियों की वैल-पैल = धक्कों से। सैल = पर्वत। उसलत = उखड़ते। तारा सौ = तारे के समान (छोटा) तरनि = सूर्य। धूरि-धारा = धूल का उड़ना। जिमि = जैसे। धारा = थाल। पारा = एक द्रव अवस्था में रहने वाली धातु। पारावार = समुद्र। यों हलते है = इस प्रकार हिलता है।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत कवित्त छंद हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित क़वि भूषण के छंदों से लिया गया है। इस छंद में कवि, शिवाजी की विशाल सेना के युद्ध के लिए जाते हुए समय का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन कर रहा है। व्याख्या-कवि भूषण कहते हैं-जब शिवाजी युद्ध में विजय पाने के लिए विशाल सेना सजाकर और मन में उत्साह भर कर चलते हैं तो सेना के नगाड़ों का भारी नाद गूंजने लगता है। हाथियों की कनपटियों से टपकने वाले मद से नदी और नद बहने लगते हैं। शिवाजी की सेना के आगे बढ़ने पर सारे संसार की गली-गली में खलबली मच जाती है और सेना के असंख्य हाथियों के धक्कों से पर्वत भी उखड़ने लगते हैं। विशाल सेना के चलने से उड़ने वाली धूल में सूर्य भी एक तारे के जैसा टिमटिमाता दिखाई देता है और धरती के हिलने से समुद्र भी इस प्रकार डोलने लगता है जैसे थाल पर रखा पारा थाल को लेकर चलने पर इधर-उधर ढुलको करता है।
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नवधा भक्ति
श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड

💕भगवान् श्रीराम जब भक्तिमती शबरीजी के आश्रम में आते हैं तो भावमयी शबरीजी उनका स्वागत करती हैं, उनके श्रीचरणों को पखारती हैं, उन्हें आसन पर बैठाती हैं और उन्हें रसभरे कन्द-मूल-फल लाकर अर्पित करती हैं। प्रभु बार-बार उन फलों के स्वाद की सराहना करते हुए आनन्दपूर्वक उनका आस्वादन करते हैं। इसके पश्चात् भगवान राम शबरीजी के समक्ष नवधा भक्ति का स्वरूप प्रकट करते है I

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं सावधान सुनु धरु मन माहीं
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा

💕अर्थात् :- मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर पहली
भक्ति है संतों का सत्संग | दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ||

💕अर्थात् :-तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा करना और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें अर्थात कीर्तन करना भक्ति है

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा पंचम भजन सो बेद प्रकासा
छठ दम सील बिरति बहु करमा निरत निरंतर सज्जन धरमा

💕अर्थात् :- मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास - यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना

सातवँ सम मोहि मय जग देखा मोतें संत अधिक करि लेखा
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा

💕अर्थात् :- सातवीं भक्ति है जगत् भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को देखना

नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष दीना ||
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई नारि पुरुष सचराचर कोई

💕अर्थात् :- नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद ) का होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो I

सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें ।।
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥

💕अर्थात् :- हे भामिनि! मुझे वही हे अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है अतएव जो गति
योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है

✨💕✨💕जय श्री राम 💕✨💕

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शेष महेश गणेश दिनेश , सुरेश जाहि निरंतर गावे
जाहि अनादि अनंत अखंड , अछेद अभेद सुवेद बतावे ।।
नारद से शुक व्यास रटे , पवि हारे तऊ पुनि पार ना पावे ।।
ताहि अहीर की छोहरिया ,छछिया भर छाछ पे नाच नचावे ।। -

अर्थ : शेष यानी शेषनाग महेश यानी शिवजी दिनेश यानी सूर्यदेव, सुरेश यानी इंद्रदेव यह सब देवता गण जिसकी पूजा करते हैं जिसको अनादि यानी जिसका उद्भव ना अंत पता है, जिसके खंड नही किए जा सकते हैं जिस में छेद ना किए जा सकते हो, भेदना संभव नहीं है ऐसा वेद बताते हैं ।नारद शुक व्यास जैसे ऋषि मुनि इनके बारे में जानने का प्रयत्न करते हैं पर हार जाते हैं ऐसे श्री कृष्ण जी को अहीरों की लड़कियां थोड़ा-थोड़ा मक्खन दिखाकर नाचने को कहती हैं वह नाचते भी है.

मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः।।

अर्थात जिसकी दृष्टि में पराई नारियां माता के समान हैं, पराया धन मिट्टी के ढेले के समान है और सभी प्राणी अपने ही समान हैं, वही ज्ञानी है।


कालतंतु कारेचरन्ति एनर मरिष्णु,निर्मुक्तेर कालेत्वम अमरिष्णु। .

नमस्ते अस्तु भगवन विश्वेश्वराय महादेवाय
त्र्यम्बकाय त्रिपुरान्तकाय त्रिकालाग्निकालाय
कालाग्निरुद्राय नीलकण्ठाय मृत्युंजयाय
सर्वेश्र्वराय सदाशिवाय श्रीमन् महादेवाय नमः।।

शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते

Those who bring wellness, health, wealth and prosperity,
tended to destroy the idea of enmity,
The flame of the lamp salutes you.

अस्थिरं जीवितं लोके अस्थिरे धनयौवने।*
*अस्थिरा: पुत्रदाराश्र्च धर्मकीर्तिद्वयं स्थिरम्॥*

*भावार्थ*
इस जगत में जीवन सदा नहीं रहने वाला है, धन और यौवन भी सदा नहीं रहने वाले हैं, पुत्र और स्त्री भी सदा नहीं रहने वाले हैं। केवल धर्म और कीर्ति ही सदा रहने वाले हैं।

नैवाकृतिः फलति नैव कुलं शीलं*
*विद्यापि नैव यत्नकृतापि सेवा।*
*भाग्यानि पूर्वतपसा किल संचितानि*
*काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।*

*अर्थात्* मनुष्य की आकृति, कुल, चरित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इन में से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नहीं है।
परंतु जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते हैं, ठीक उसी प्रकार पूर्व में किए गए तप से संचित हुए कर्म योग्य समय पर मनुष्य को फल देते हैं।

दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः
दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते

Deep – Jyoti is the Supreme Brahman, the light of the lamp
is the protector of the world.
O divine lamp, wash away all my sins.
Greetings to you, the divine lamp of the evening.

 

"लक्ष्मि आगच्छ अलक्ष्मि निस्सर", for Maha-Lakshmi (Peace/Harmony & Well-being ) & Alakshmi (ill-being/Catastrophe) to leave: Pray for the suffering World, the Peoples, the Nations, the Families and Friends: May the Mother Creatrix herald Peace, Prosperity and Happiness with her effervescent, immanent Light, and immutable Force of Order!
।। यं यं चिन्तयते कामम् तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।।
ऊँ शाँतिः, ऊँ शाँतिः ऊँ शान्तिः 🙏🙏🙏

अस्थिरं जीवितं लोके अस्थिरे धनयौवने।*
*अस्थिरा: पुत्रदाराश्र्च धर्मकीर्तिद्वयं स्थिरम्॥*
*भावार्थ*
इस जगत में जीवन सदा नहीं रहने वाला है, धन और यौवन भी सदा नहीं रहने वाले हैं, पुत्र और स्त्री भी सदा नहीं रहने वाले हैं। केवल धर्म और कीर्ति ही सदा रहने वाले हैं।

नैवाकृतिः फलति नैव कुलं शीलं*
*विद्यापि नैव यत्नकृतापि सेवा।*
*भाग्यानि पूर्वतपसा किल संचितानि*
*काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।*

*अर्थात्* मनुष्य की आकृति, कुल, चरित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इन में से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नहीं है।
परंतु जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते हैं, ठीक उसी प्रकार पूर्व में किए गए तप से संचित हुए कर्म योग्य समय पर मनुष्य को फल देते हैं।

 

- यह अधोलिखित पद्य और उनके भावार्थ से पता चलता है। 

*कःखगौघाङचिच्छौजा झाञ्ज्ञोऽटौठीडडण्ढणः।*
*तथोदधीन् पफर्बाभीर्मयोऽरिल्वाशिषां सहः॥*

अर्थात्- पक्षिओं का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का , दुसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु। संहारको में अग्रणी, मनसे निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करता कौन? राजा मय कि जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं। "

आप देख सकते हैं कि संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस पद्य में जाते हैं इतना ही नहीं, उनका क्रम भी योग्य है। 

- एक ही अक्षरों का अद्भूत अर्थ विस्तार...

माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल "" और " " दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। 

*भूरिभिर्भारिभिर्भीभीराभूभारैरभिरेभिरे।
*भेरीरेभिभिरभ्राभैरूभीरूभिरिभैरिभा:।।

अर्थात्- धरा को भी वजन लगे ऐसा वजनदार, वाद्य यंत्र जैसा अवाज निकाल ने वाले और मेघ जैसा काला निडर हाथी ने अपने दुश्मन हाथी पर हमला किया। "

- किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल " " व्यंजन से अद्भूत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य का प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है...

नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत्।।

अर्थात् - जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है।

*●ऐसे अनेक मधुर उदाहरण हमारे अन्यान्य पुरातन संस्कृत साहित्य के ग्रन्थों में ही देखने को मिलता है।*

*वन्दे संस्कृतम्।*
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*"श्री.तुलसीदासजी"* से एक भक्त ने पूछा कि...
*"महाराज आप श्रीराम के इतने गुणगान करते हैं , क्या कभी खुद श्रीराम ने आपको दर्शन दिए हैं * ?..
तुलसीदास बोले :- " हां "
भक्त :- महाराज क्या आप मुझे भी दर्शन करा देंगे ???
तुलसीदास :- " हां अवश्य "
*तुलसीदास जी ने ऐसा मार्ग दिखाया कि एक गणित का विद्वान भी चकित हो जाए !!!*
*तुलसीदास जी ने कहा , ""अरे भाई यह बहुत ही आसान है !!! तुम श्रीराम के दर्शन स्वयं अपने अंदर ही प्राप्त कर सकते हो.""*
*हर नाम के अंत में राम का ही नाम है.*

इसे समझने के लिए तुम्हे एक *"सूत्रश्लोक "* बताता हूं .
यह सूत्र किसी के भी नाम में लागू होता है !!!
भक्त :-" कौनसा सूत्र महाराज ?"
*तुलसीदास* :- यह सूत्र है ...
*||"नाम चतुर्गुण पंचतत्व मिलन तासां द्विगुण प्रमाण || || तुलसी अष्ट सोभाग्ये अंत मे शेष राम ही राम || "*

इस सूत्र के अनुसार
*अब हम किसी का भी नाम ले और उसके अक्षरों की गिनती करें*...
*)उस गिनती को (चतुर्गुण) से गुणाकार करें*.
*) उसमें (पंचतत्व मिलन) मिला लें.*
*) फिर उसे (द्विगुण प्रमाण) दुगना करें.*
*)आई हुई संख्या को (अष्ट सो भागे) से विभाजित करें .*
*"" संख्या पूर्ण विभाजित नहीं होगी और हमेशा शेष रहेगा!!! ...
*यह ही "राम" है। यह अंक ही " राम " अक्षर हैं*...

विश्वास नहीं हों रहा है ना???
चलिए हम एक उदाहरण लेते हैं ...
आप एक नाम लिखें , अक्षर कितने भी हों !!!
उदा. ..निरंजन... अक्षर
) से गुणा करिए x=१६
) जोड़िए १६+=२१
) दुगने करिए २१×=४२
) से विभाजन करने पर ४२÷= पूर्ण अंक , शेष !!!
*शेष हमेशा दो ही बचेंगे,यह बचे अर्थात् - "राम" !!!*

*विशेष यह है कि सूत्रश्लोक की संख्याओं को तुलसीदासजी ने विशेष महत्व दिया है*!!!
1) *चतुर्गुण* अर्थात् * पुरुषार्थ* :- *धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष* !!!
2) *पंचतत्व* अर्थात् *पंचमहाभौतिक* :- *पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु , आकाश*!!!
3) *द्विगुण प्रमाण* अर्थात् *माया ब्रह्म* !!!
4) *अष्ट सो भागे* अर्थात् *अाठ दिशायें*
( *चार दिशा* :-पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण ,
*चार उपदिशा* - आग्नेय,नैऋत्य, वायव्य, ईशान्य, *आठ प्रकारची लक्ष्मी* (आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग आणि योगलक्ष्मी )

अब यदि हम सभी अपने नाम की जांच इस सूत्र के अनुसार करें तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि हमेशा शेष ही प्राप्त होगा ...
इसी से हमें श्री तुलसीदास जी की बुद्धिमानी और अनंत रामभक्ति का ज्ञान होता है !!!
🙏🏻 *जय श्रीराम* 🙏🏻
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