Monday, May 4, 2026

Papaji's Poem-3 


भोपाल की भोर

 

रात भर बरसते रहे

अच्छा हुआ

वरना परेशान

दिन भर।

 

अचानक

झूले - सा नीचे

ऊपर फिर

झटके में ऊपर उठ

इतने ऊंचे चलने वाले

इतना सा खतरा तो झेलना ही होगा 

 

 

बहस

आप चल रहे

नहीं

मैं खड़ा

चल तो आप रहे।

प्रेम

प्रेम तो

भावुकता है

आप में आने के

बाद बात करें

 

सपने में

चल रहे आप

जगा  दीजिए।

 

प्रेम में

ठोकर कहाँ

धरती से

चलते ऊपर।

 

प्रेम ईथर

हवा से पतला ,

दिखेगा कैसे 

 

प्रेम आदमी से

नहीं

आदमी करता

नहीं।

 

प्रेम के 

फूल - फल

फिर भी यूं

महकता।

 

प्रेम के

पांव  चक्के

फिर भी यूं

फिरता।

 

ऑंसू

 

भरा है सागर ,

छूते ही

लहर पर लहर

ऑंसू उभरते।

बात-बात

पर आंसू ,

आदत नहीं

दर्द होता

इन बातों पर।

 

आपकी बातों पर

आती है हंसी

क्यों रोने की

नहीं कोई बात।

 


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