Papaji's Poem-3
भोपाल की भोर
रात भर बरसते रहे
अच्छा हुआ
वरना परेशान
दिन भर।
अचानक
झूले - सा नीचे
ऊपर फिर
झटके में ऊपर उठ
इतने ऊंचे चलने वाले
इतना सा खतरा तो झेलना ही होगा ।
बहस
आप चल रहे
नहीं
मैं खड़ा
चल तो आप रहे।
प्रेम
प्रेम तो
भावुकता है
आप में आने के
बाद बात करें
सपने में
चल रहे आप
जगा न दीजिए।
प्रेम में
ठोकर कहाँ
धरती से
चलते ऊपर।
प्रेम ईथर
हवा से पतला ,
दिखेगा कैसे ।
प्रेम आदमी से
नहीं
आदमी करता
नहीं।
प्रेम के न
फूल - फल
फिर भी यूं
महकता।
प्रेम के
पांव न चक्के
फिर भी यूं
फिरता।
ऑंसू
भरा है सागर ,
छूते ही
लहर पर लहर
ऑंसू उभरते।
बात-बात
पर आंसू ,
आदत नहीं
दर्द होता
इन बातों पर।
आपकी बातों पर
आती है हंसी
क्यों रोने की
नहीं कोई बात।
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