Monday, May 4, 2026

Papaji's Poem-5


 चल

लोग - बाग

क्यों रुकेंगे यहाँ

एक बीमार के लिए।

कारवां चलते चले ,

रुका सा रह लिए।

चल उठ,

अभी तुझे जाना है

पता नहीं कितनी दूर ,

पीछे रह गया अकेला।

 

तुझे नहीं चलना भीड़ में,

मत गिन अभी से

दिनमाह बरस।

तेरी राह सूनी अब भी

चलचलचला , चल अकेला !!

 

तू अकेला कहाँ ?

जब जुड़ा जमाने से  ,

सब तेरे साथ हैं ,

आगे - पीछे होना

महज वक्त की बात ,

नहीं तू अकेला !

 

चल मनुवा

मत हो उदास।

वक्त तो गूंगा है ,

यह बड़बोले नहीं

वक्त की कोई आवाज 

 

छोड़ो उनकी बात

जरा सी आँच में

पिघल रहेये लोग।

तुझे इस सर्द - गरम से

क्या लेनाक्या देना ?

तू क्यों इन छोटी-छोटी बातों में

कदम थाम रुक गया ?

चल उठ,

चल उठ

कोई नहीं जगाने वाला

जगाने वाले तो सो गए

या चले गए बहुत दूर

छोड़कर यह मेला।

 

अपने को मत समझ

बड़ा या छोटा इस भीड़ से

तू अपने मकसद में है अकेला।

बस ,

उम्मीद मत रख

किसी से जो तुझे देखे।

बस

चला चलचला चल , अकेला।

बची हुई तीलियों और मोमबत्ती के

भरोसे लड़ोगे अंधेरे से ?

अभी तो चांद - सूरज हैं ,

उन्हें भरोसे में करचला चलचला चल 

 

बांधकर पत्थर में

शब्द तेरे छोड़ना जा

कुछ बचें और कुछ बचें

तुझे क्या ,

तू तो चल कुछ शब्द लिखता जा।

-----------

तुम बिन

 

चांदी सी रात

सोने से दिन

कितने सूने - सूखे

लगते हैं तुम बिन।

 

बीत गए दिन

बीती हैं रात

सूखी है धरती

प्यासीबिन बरसात।

 

बैठे हैं भीड़ में गुमसुम

नहीं कोई सुख ,

नहीं कोई गम।

फिर भी कोफ्त में भरे

बैठे हैं अकेले हम।

 

जब भी बोलें -

होठों पर बोल आते।

आपके कान सुनते

अनसुनी कर जाते।

 

हम बाट जोहते रहते

अनकही कथा भी गुनते

पर मन के तालों से

कुछ महकते झोंके आते।।

------------

अपनी राह जमाना चल रहा

 

अब तो बात - बात पर

बह आता पानी खारा

मानो कोई भरे तालाब का

पुटता कहीं दरक गया

थोड़ा सा।

 

क्या करे आदमी

हवा में ही लोचापन भर गया ,

कहाँ तक रोकेगा

मीठापन जबान में ,

यह पानी ही पानी बह रहा।

 

कभी तो चल नहीं पाया

आदमी सलीके से

और ना बोल पाया कायदे से।

आजकल ठोकर ही लगी ,

यह लाजमी था ,

उफ़ को सुनेगा कौन

 क्यों अब कराह !

 

बहुत फिर चुका ,

कम से कमचुप बैठ,

हवा को तो बिगाड़ नहीं देगा तू,

बड़ा बहम  रखा पचास बरस

कि  शब्दों से कुछ जोड़ लेगा ,

शब्दों में मोह लगा ,

लोग समझदार हो गए।

शब्दों के भुलावे उतर गए।

तुझे भी समझ कर शब्दों का सौदागर

अपनी राह जमाना चल रहा।

No comments:

Post a Comment