Wednesday, July 16, 2014

some lines


काँटों से गुज़र जाना, शोलों से निकल जाना,
जब फूलों की बस्ती आए तो संभल कर जाना।

दिन अपने चिराग़ों से कुछ इस तरह जलते हैं,
हर सुबह को बुझ जाना, हर शाम को जल जाना।

बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी
एक मुद्दत से हमें उसने सताया भी नहीं


1. आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक?

बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी
एक मुद्दत से हमें उसने सताया भी नहीं


2. दाम हर मौज में है हल्का-ए-सद-काम-ए-नाहंग,
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक।

[दाम = जाल/फँदा, मौज = लहर, हल्का = घेरा, सद = सौ, नाहंग = मगरमच्छ, सद-काम-ए-नाहंग = सौ जबड़ों वाला मगरमच्छ, गुहर = मोती]


3. आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक?

[सब्र = धैर्य, तलब = चाह/खोज]


4. हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे, लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुमको ख़बर होने तक।

[तग़ाफ़ुल = उपेक्षा/अनदेखी]


5. परतव-ए-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की तालीम,
मैं भी हूँ इक इनायत की नज़र होने तक।

[परतव-ए-ख़ुर = सूरज की किरण/प्रतिबिंब, शबनम = ओस, फ़ना = नश्वरता/मिट जाना, इनायत = कृपा]


6. यक-नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल,
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर होने तक।

[बेश = बहुत, फ़ुर्सत-ए-हस्ती = जीवन का समय, ग़ाफ़िल = बेख़बर, रक़्स = नृत्य, शरर = चिंगारी]

7. ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किससे हो जुज़ मर्ग इलाज,
शम्मा हर रंग में जलती है सहर होने तक।

[हस्ती = जीवन/अस्तित्व, जुज़ = सिवाय/के अलावा, मर्ग = मृत्यु, सहर = सुबह]


तमाम उम्र उसी के ख़याल में गुज़री ‘फ़राज़’,
मेरा ख़याल जिसे उम्र भर नहीं आया।


ये दिन भी क़यामत की तरह गुज़रा है ‘फ़राज़’,
जाने क्या बात थी हर बात पे रोना आया।


बस वो शख़्स अच्छा लगा, उसे साफ़ कह डाला हमने ‘फ़राज़’,
दिल की बात है, हमसे मुनाफ़िक़त न हो सकी।


एक ख़लिश अब भी मुझे बेचैन करती है ‘फ़राज़’,
सुन के मेरी मरने की ख़बर वो रोया क्यों था।


बहुत अजीब हैं ये बंदिशें मोहब्बत की ‘फ़राज़’,
न उसने क़ैद में रखा, न हम फ़रार हुए।


कुछ इस तरह नज़रअंदाज़ हो गए ‘फ़राज़’,
जैसे इज़ाफ़ी हर्फ़ थे तेरी ज़िंदगी की किताब में।


तुझ से बिछड़ के बचपन का ये भेद खुला,
क्यों लिखता था मैं पैरों पे “तन्हा तन्हा”।


कोई नहीं है मेरे जैसा चारों ओर,
अपने गिर्द एक भीड़ सजा के “तन्हा” हूँ।


प्यार में इक ही मौसम है बहारों का ‘फ़राज़’,
लोग कैसे मौसमों की तरह बदल जाते हैं।


जब ख़िज़ां आएगी तो लौट आएगा वो भी ‘फ़राज़’,
वो बहारों में ज़रा कम ही निकला करता है।

-जिस को भी चाहा उसे शिद्दत से चाहा है ‘फ़राज़’,

सिलसिला टूटा नहीं दर्द की ज़ंजीर का।


आज दिल खोल के रोए हैं तो यूँ खुश हैं ‘फ़राज़’,
चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे।


हिज्र की रात बहुत लंबी है ‘फ़राज़’,
आओ उसकी याद में थक के सो जाएँ।


कुछ तू ही मेरे दर्द का मफ़हूम समझ ले ‘फ़राज़’,
हँसता हुआ चेहरा तो ज़माने के लिए है।


तुम ताल्लुक तोड़ने का कहीं ज़िक्र न करना ‘फ़राज़’,
मैं लोगों से कह दूँगा कि उसे फ़ुर्सत नहीं मिलती।


ज़लज़ले यूँ ही बे-सबब नहीं आते ‘फ़राज़’,
कोई दीवाना तह-ए-ख़ाक तड़पता होगा।


मैंने जिस शाख़ को फूलों से सजाया था ‘फ़राज़’,
मेरे सीने में उसी शाख़ का काँटा उतरा।


हम न बदलेंगे वक़्त की रफ़्तार के साथ ‘फ़राज़’,
हम जब भी मिलेंगे अंदाज़ पुराना होगा।


बड़ा अँधेरा था उनकी राहों में ऐ दिल ‘फ़राज़’,
मैं अपना घर न जलाता तो और क्या करता।


हमने महबूब जो बदला तो तअज्जुब कैसा ‘फ़राज़’,
लोग काफ़िर से मुसलमान भी तो हो जाते हैं।


वो भी रो देगा उसे हाल सुनाएँ कैसे,
मोम का घर है चिरागों को जलाएँ कैसे।


दूर होता तो उसे ढूँढ भी लेते ‘फ़राज़’,
रूह में छुप के जो बैठा है उसे पाएँ कैसे।


मैंने तो अपनी तन्हाइयों से तंग आकर दोस्त बनाए थे ‘फ़राज़’,
दोस्त भी ऐसे मिले कि मुझे और तन्हा कर गए।


मुझे ग़ुरूब न जानो जो मैं उफ़क़ पे नहीं ‘फ़राज़’,
बिखर गया हूँ अँधेरों में कहकशाँ की तरह।


बहाना क्यों तराशा रूठ जाने का ‘फ़राज़’,
बस इतना कह देते कि दिल में जगह नहीं रही।


पहले तराशा उसने मेरा वजूद शीशे से ‘फ़राज़’,
फिर ज़माने भर के हाथों में पत्थर थमा दिए।


पानी में अक्स देख कर खुश हो रहा था ‘फ़राज़’,
पत्थर किसी ने मार कर मंज़र बदल दिया।


ऐ इंसान, इब्न-ए-आदम से नंगा आया है तू ‘फ़राज़’,
कितना सफ़र किया है तूने दो गज़ कफ़न के लिए।


अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे ‘फ़राज़’,
क्यों तन्हा से हो गए हैं तेरे जाने के बाद।


एक ही ज़ख़्म नहीं, सारा बदन ज़ख़्मी है ‘फ़राज़’,
दर्द हैरान है कि उठूँ तो कहाँ से उठूँ।


सब रौशनियाँ मुझसे रूठ गईं ये कह कर ‘फ़राज़’,
तुम अपने चिरागों की हिफ़ाज़त नहीं करते।


तमाम उम्र मुझे टूटना बिखरना था ‘फ़राज़’,
वो मेहरबान भी कहाँ तक समेटता मुझे।


लोग कहते हैं कि मुलाक़ात नहीं हुई ‘फ़राज़’,
हम तो रोज़ मिलते हैं लेकिन बात नहीं होती।


मैं जो महका तो मेरी शाख़ जला दी उसने ‘फ़राज़’,
सब्ज़ मौसम में मुझे ज़र्द हवा दी उसने।


टूट कर चुभ रहा है आँखों में ‘फ़राज़’,
आईना तो नहीं था ख़्वाब मेरा।


दाग़ दामन के हों, दिल के हों या चेहरे के ‘फ़राज़’,
कुछ निशान उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं।


इश्क़ की राह में दो ही मंज़िलें ‘फ़राज़’,
या दिल में उतर जाना, या दिल से उतर जाना।


आँख मसरूफ़-ए-नज़ारा थी तो हम खुश थे ‘फ़राज़’,
तुमने क्या ज़ुल्म किया दिल में ठिकाना कर के।


तेरे ख़ुलूस ने बर्बाद कर दिया है ‘फ़राज़’,
फ़रेब देते तो कब के संभल गए होते।


तुम से बिछड़ कर ज़ेहन ऐसा हुआ मुंतशिर ‘फ़राज़’,
कि लोगों से अपने घर का पता पूछना पड़ा।


ज़माने के सवालों को मैं हँस के टाल दूँ ‘फ़राज़’,
लेकिन नमी आँखों की कहती है “मुझे तुम याद आते हो।”


ये दिन भी क़यामत की तरह गुज़रा है ‘फ़राज़’,

जाने क्या बात थी हर बात पे रोना आया।


बस वो शख़्स अच्छा लगा, उसे साफ़ कह डाला हमने ‘फ़राज़’,
दिल की बात है, हमसे मुनाफ़िक़त न हो सकी।


एक ख़लिश अब भी मुझे बेचैन करती है ‘फ़राज़’,
सुन के मेरी मरने की ख़बर वो रोया क्यों था।


बहुत अजीब हैं ये बंदिशें मोहब्बत की ‘फ़राज़’,
न उसने क़ैद में रखा, न हम फ़रार हुए।


कुछ इस तरह नज़रअंदाज़ हो गए ‘फ़राज़’,
जैसे इज़ाफ़ी हर्फ़ थे तेरी ज़िंदगी की किताब में।


तुझ से बिछड़ के बचपन का ये भेद खुला,
क्यों लिखता था मैं पैरों पे “तन्हा तन्हा”।


कोई नहीं है मेरे जैसा चारों ओर,
अपने गिर्द एक भीड़ सजा के “तन्हा” हूँ।


प्यार में इक ही मौसम है बहारों का ‘फ़राज़’,
लोग कैसे मौसमों की तरह बदल जाते हैं।


जब ख़िज़ां आएगी तो लौट आएगा वो भी ‘फ़राज़’,
वो बहारों में ज़रा कम ही निकला करता है।

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जिस को भी चाहा उसे शिद्दत से चाहा है ‘फ़राज़’,
सिलसिला टूटा नहीं दर्द की ज़ंजीर का।


आज दिल खोल के रोए हैं तो यूँ खुश हैं ‘फ़राज़’,
चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे।


हिज्र की रात बहुत लंबी है ‘फ़राज़’,
आओ उसकी याद में थक के सो जाएँ।


कुछ तू ही मेरे दर्द का मफ़हूम समझ ले ‘फ़राज़’,
हँसता हुआ चेहरा तो ज़माने के लिए है।


तुम ताल्लुक तोड़ने का कहीं ज़िक्र न करना ‘फ़राज़’,
मैं लोगों से कह दूँगा कि उसे फ़ुर्सत नहीं मिलती।


ज़लज़ले यूँ ही बे-सबब नहीं आते ‘फ़राज़’,
कोई दीवाना तह-ए-ख़ाक तड़पता होगा।


मैंने जिस शाख़ को फूलों से सजाया था ‘फ़राज़’,
मेरे सीने में उसी शाख़ का काँटा उतरा।


हम न बदलेंगे वक़्त की रफ़्तार के साथ ‘फ़राज़’,
हम जब भी मिलेंगे अंदाज़ पुराना होगा।


बड़ा अँधेरा था उनकी राहों में ऐ दिल ‘फ़राज़’,
मैं अपना घर न जलाता तो और क्या करता।


हमने महबूब जो बदला तो तअज्जुब कैसा ‘फ़राज़’,
लोग काफ़िर से मुसलमान भी तो हो जाते हैं।


वो भी रो देगा उसे हाल सुनाएँ कैसे,
मोम का घर है चिरागों को जलाएँ कैसे।
दूर होता तो उसे ढूँढ भी लेते ‘फ़राज़’,
रूह में छुप के जो बैठा है उसे पाएँ कैसे।


मैंने तो अपनी तन्हाइयों से तंग आकर दोस्त बनाए थे ‘फ़राज़’,
दोस्त भी ऐसे मिले कि मुझे और तन्हा कर गए।

-मुझे ग़ुरूब न जानो जो मैं उफ़क़ पे नहीं ‘फ़राज़’,

बिखर गया हूँ अँधेरों में कहकशाँ की तरह।


बहाना क्यों तराशा रूठ जाने का ‘फ़राज़’,
बस इतना कह देते कि दिल में जगह नहीं रही।


कब मुझ को ऐतिराफ़-ए-मुहब्बत न था ‘फ़राज़’,
कब मैंने ये कहा था सज़ाएँ मुझे न दो।


पहले तराशा उसने मेरा वजूद शीशे से ‘फ़राज़’,
फिर ज़माने भर के हाथों में पत्थर थमा दिए।


हम सुना रहे थे अपनी बेवफ़ाई का क़िस्सा ‘फ़राज़’,
अफ़सोस इस बात का—औरों ने तो वाह-वाह की, उन्होंने भी वाह-वाह की।


पानी में अक्स देख कर खुश हो रहा था ‘फ़राज़’,
पत्थर किसी ने मार कर मंज़र बदल दिया।


ऐ इंसान, इब्न-ए-आदम से नंगा आया है तू ‘फ़राज़’,
कितना सफ़र किया है तूने दो गज़ कफ़न के लिए।


अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे ‘फ़राज़’,
क्यों तन्हा से हो गए हैं तेरे जाने के बाद।


एक ही ज़ख़्म नहीं, सारा बदन ज़ख़्मी है ‘फ़राज़’,
दर्द हैरान है कि उठूँ तो कहाँ से उठूँ।


सब रौशनियाँ मुझसे रूठ गईं ये कह कर ‘फ़राज़’,
तुम अपने चिरागों की हिफ़ाज़त नहीं करते।

-तमाम उम्र मुझे टूटना बिखरना था ‘फ़राज़’,

वो मेहरबान भी कहाँ तक समेटता मुझे।


लोग कहते हैं कि मुलाक़ात नहीं हुई ‘फ़राज़’,
हम तो रोज़ मिलते हैं लेकिन बात नहीं होती।


मैं जो महका तो मेरी शाख़ जला दी उसने ‘फ़राज़’,
सब्ज़ मौसम में मुझे ज़र्द हवा दी उसने।


टूट कर चुभ रहा है आँखों में ‘फ़राज़’,
आईना तो नहीं था ख़्वाब मेरा।


तुम्हारी दुनिया में हम जैसे हज़ारों हैं ‘फ़राज़’,
हम ही पागल थे जो तुम्हें पा कर इतराने लगे।


दाग़ दामन के हों, दिल के हों या चेहरे के ‘फ़राज़’,
कुछ निशान उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं।


इश्क़ की राह में दो ही मंज़िलें ‘फ़राज़’,
या दिल में उतर जाना, या दिल से उतर जाना।


आँख मसरूफ़-ए-नज़ारा थी तो हम खुश थे ‘फ़राज़’,
तुमने क्या ज़ुल्म किया दिल में ठिकाना कर के।


तेरे ख़ुलूस ने बर्बाद कर दिया है ‘फ़राज़’,
फ़रेब देते तो कब के संभल गए होते।

तुम्हारी दुनिया में हम जैसे हज़ारों हैं ‘फ़राज़’,
हम ही पागल थे जो तुम्हें पा कर इतराने लगे।


दाग़ दामन के हों, दिल के हों या चेहरे के ‘फ़राज़’,
कुछ निशान उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं।


इश्क़ की राह में दो ही मंज़िलें ‘फ़राज़’,
या दिल में उतर जाना, या दिल से उतर जाना।


आँख मसरूफ़-ए-नज़ारा थी तो हम खुश थे ‘फ़राज़’,
तुमने क्या ज़ुल्म किया दिल में ठिकाना कर के।


तेरे ख़ुलूस ने बर्बाद कर दिया है ‘फ़राज़’,
फ़रेब देते तो कब के संभल गए होते।


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