Friday, May 3, 2013

तस्वीर


 
आधी  - अधूरी तस्वीर

जाने कहाँ - चित्रकार ?

आड़ी - तिरछी लकीरें,

कोई सीधी- किरण सूरज की हो,

तो कहीं थरथराती - सागर की लहर कोई।

थमा गया यह कटोरा,

फ़िर रहा मैं पर्वत जंगल-

झरनों से झरता निर्मल जल

भरता कटोरे में- पर

छलक जाता कभी तो

कभी सोख लेता कटोरा।

मुझसे भी बड़ा- साया मेरा

रंग सारे बदरंग कर रहा

मैं तरबतर पसीने में अपने

साये में अपने सुस्ताऊँ कैसे ?

क्या इन्हीं आधी अधूरी लकीरों में ही

छिपी अनगिनत तस्वीरें ?

पर कहाँ वो चित्रकार?

कहाँ उसकी तूली?

कहाँ छिपा रखे रंग अनेक ?

Sunday, February 3, 2013

भय


उतरता एक गिद्ध्
दूर ऊंची, चोटी पहाड़ियों से
लहराता, मचलता-
झरनों सा मदमस्त,
हवा की तरंगों पर झूमता
पेड़ों के झुरमुट से
आँख मिचोली करता ।
निगाहें दौड़ाता - चारों तरफ़
पर लक्ष्य कर चुका
अपना सिद्ध ।
धीरे -धीरे, परछाईं उसकी
बढ़ रही जमीन पर
उससे भी बड़ी, भयानक
और
देख जिसे - स्तंभित
नन्हा शशक शावक ।

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दूब की पत्ती

पत्ती - एक दूब की
रात भर बोझल,
बूंद एक - ओस से ।
तरसती रही - सूरज की,
हल्की एक किरण ।
रात ढल - छ्लका सवेरा
हल्का बोझ, दूब का हुआ ।
चढ़ा दिन - हुई दुपहरी
अब झुलस रही-
पत्ती वही दूब की ।

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Wednesday, May 2, 2012

भाव

भाव
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रोक लो-
शब्द.
सब,
अर्थहीन

सीमाहीन
शक्ति
उस पार -
तक रही
आँखें इस द्वार -
शक्तिहीन.

ढूँढ लो,
साथी -
पंक्तिहीन
पंखहीन.

यह पल -
यह भाव -
सिर्फ भेदहीन
संपर्क विहीन....

साज और धुन

साज और धुन



कैसी यह आवाज ?
जाने कहाँ से आती?

घुल जाती
कानों में .
उतर जाती
दिल की तह तक.
धरोहर में मिली
इस अनजान डगर पर.
चारों तरफ उड़ती गर्द,
शोर फैला काफिलों का
पर, यह धुन- निरंतर.

अलग ही पहचान इसकी
सुनी अनसुनी -
लगती नहीं.
सब खोये -
चल रहे धुन पर
मदमस्त, उन्मद, भावुक.
कौन सा साज
छेड़ रहा धुन ऐसी .

राहें बदल-बदल
देखने निकले कई.
कोई जंगल देख-
मुड़ गया .
कोई पर्वत देख -
चढ़ गया
झरना देख-
रुक गया कोई
तो साथ हो लिया -
देख नदी की चाल
अपनी ही धुन में,
रमा ली धुन की सरगम.
कई गुम हो गए ,
कई लौटे -
कोई चुप ,
आँखें - जाने क्या देखी
कानों ने - जाने क्या सुना
बस- अवाक.
सिर्फ खामोश
लब कह रहे
अपनी दास्तान .
मेले से लग जाते जाने
कितनी कहानी.
पर समझते विरले.
जाने कितनी ज़ुबानी

कैसा यह साज ?
छेड़ रहा कौन ?
अब तक -
यह प्रश्न
उतना ही मौन.
मन रहे अशांत
धीरज बंधाती -
यह धुन .
मन रहे - उन्मद
थिरकती साथ धुन.


हवा की तरंगों से-
बंधी नहीं
अंतरिक्ष तक देख-
सीमित नहीं .
समय के साथ-
चलती - नहीं
जीवन से परे -
मृत्यु से - विमुख ,
जाने कितनी सदियों
सुना अगणित मनीषियों ने
अथक बखाना.
उलझाया तर्क - कुतर्कों में
बाँट दिया कारवाँ -
जो था कभी साथ .
अगिनत निकली पगडंडियाँ
चलते जाते सब -
बंटते जाते सब.


सतरंगी सी लगने लगी ,
आँखों को
छू - किरण सूरज की.
सरगमी हो गयी धुन,
कानों को छू, -
यह अद्भुत धुन.

अब तो बनाने लगे ,
अगिनत साज -
जाने कितनी चाप
सजाने धुन के स्वर,
अलापते राग-
सदियों का रियाज,
घरानों के रिवाज-
उस्तादों के अंदाज.
अलख लगाते -
महफिलें सजाते ,
अपना ही अंदाज-
अपनी ही धुनें .
कहाँ तक सुने कोई ?
कौन समझाये -
इन पाखंडियों को-
सब आलाप रहे -
धुन से परे.
साज सारे इनके-
अर्धविकसित ,
कहाँ से जगाये-
यह निर्मल धुन.

इमारत की छत

इमारत की छत


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इस इमारत की छत से ,
सारा गाँव दिखता,
टिमटिमाता लहलहाता.
अब कोई नहीं आता,
इन सीढ़ियों से,
इस छत पर.
जाने इमारतें कितनी,
बिक गयी -
अनजान से
बाजारों में.
बिक रही अब
सिर्फ छतें इनकी.

अट्टहास करती,
सज रही अट्टालिकाएं.
बिक गयी दीवारें-
कट,छट गए ,
सारे इर्द- गिर्द जंगल .
अहसास बाकी रहा ,
एक तूफ़ान का,
एक जलजले का,
एक सैलाब का.
जो सहे जाने कितने ,
इस जर्जर ,
थर्राती इमारत ने.
सब सोये बेखबर,
कोई नहीं जाता अब,
इस इमारत की छत पर.



कोई नहीं

कोई नहीं


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न पत्थरों में खुदा देखा , न इंसानों में रूह देखी

यह कैसा जहां है , जहां कोई रूबरू नहीं .



ना दिल में फसाने , ना आँखों से आंसूं बरसे ,

कैसे कह दूं महफ़िल से, मोहब्बत उनसे नहीं.



ना वो मंजर , ना वो आबो हवा रही ,

गुल तो खिलते अब भी, अब वो कशिश उनमें नहीं.



ना वो हमसफ़र , ना वो महफिलें सजतीं,

ये कैसी मुलाकातें , जहां शिकायतें नहीं.



ना पल दो पल का साथ , ना सदियों का बिछड़ना

तकती राह आँखें सूनी , पर उम्मीद अब कोई नहीं.