Sunday, October 30, 2011

पगडंडियों का सफ़र

कैसा अजीब है
यह जनपथ
सीधी है सड़क 
सामने मंजील 
पर टेढ़ी मेढ़ी चाल .
कहीं देखी पगडंडीयाँ 
रास्तों पर.
पर अनगिनत पगडंडीयाँ  बिछी -
इस जनपथ पर.
कोहराम सा मच जाता
पगडंडीयों  की सीमा छूने भर से.
गुम हो गया - वो मसीहा
बनाया जिसने
यह जनपथ .
अब तो सपोलों सी पगडंडीयाँ
निगलती जा रही
न जाने कितने कारवां .
मंजिल तक कहाँ पहुंचा कोई.
उलझ गुम हो जाता
इन्ही पगडंडीयों में .
अनदेखी दीवारें  खड़ी
इन पगडंडीयों के बीच .
हवा तक गुजर नहीं पाती
पगडंडीयों से होकर.
घुट गया जनपथ,
बंट गया पगडंडीयों के बीच.
सजती हैं महफिले
सजते हैं मेले
पगडंडीयों पर.
पर तन्हा जनपथ.
मुखोटो में ढका जनसमुद्र
न जाने कितनी बार
गुजरा समय की लहरों से
इसी जनपथ पर.

कैसा है

कैसा है- मन
बिन पंखों के उड़ता -
गगन मगन.

कैसा है- जीवन ,
कुछ नहीं अपना
पर संजोता
हर कण.

कैसी हैं- आँखें
हो कर भी दो -
दिखता एक.

कौन है-  यह अजनबी
देखा नहीं कभी
पर साथ मेरे अब भी.

कैसी है- डगर
कहीं नहीं मंजिल
पर बढ़ते ही जा रहे हमसफ़र .

Friday, October 28, 2011

होली -भाई रे

पापा-
कौन हमारा है
राष्ट्रीय पक्षी -
मोर.
और राष्ट्रीय खेल
हाकी.
और राष्ट्रीय त्यौहार
मैं अवाक चुपचाप
ढूंढ नहीं पाया जवाब.
होली हो- तो कैसा हो,
जवाब ने तोड़ी खामोशी
लगा निद्रा मेरी भंग हुई
हूँ...तक ही
कह पाया
हो सकता है -
पर क्यों?
अनायास पूछ बैठा.
क्यों नहीं

बेटे ने-जवाब दिया.
त्यौहार होली का - रंगों का
खुशी बांटने का,
गले मिलने का.
कितना मजा-जो है.

वाकई .. सोचने लगा मैं
पर कहते हैं
मूर्खों का भी
यही दिन एक
होली का दिन.
हाँ बेटे.. होली
हो सकता है.. यकीनन.
होली हिन्दुस्तान में ही
खेली जा सकती .
मेरा भारत ही
जनक हो सकता
होली त्यौहार का.

मैं सोचता रहा
कहाँ से शुरू करूँ
कौन कौन से
जताऊँ कारण
और  होली को
राष्ट्रीय त्यौहार बनाऊं.
आदि युग से शुरू करूं
जब पूर्वजों ने
वसुधेव कुटुम्बकम का राग अलापा
परिकल्पना की राम राज्य की.
गूँज हो रही अब तक
दसों  दिशाओं में.
पर मंजिल से
उतनी ही दूर अब तक.
शायद पहली होली खेली थी
अयोध्या में
जब  लात मारी थी
भरत ने मंथरा को ..
पर बड़ी देर से
छोड़ चुके थे
राज पाट राम ने
और होली मनाने
चल पड़ा समय
सरयू के पार.
सीता ने भी
मनाई होगी
जब बैठी थी नदी किनारे
परित्यक्ता, आसन्न प्रसवा, असहाय.
विहंसी सी हंसी
तैर गयी लबों पर
जब देखी अयोध्या ..
जगमगाती होली के
रंगीन रंगों में.
कोई अंतर नज़र नहीं पाया
लंका व अयोध्या में
राम या रावण में दोनों ने  ही
परिहास किया
उसकी अस्मिता का .
एक ने महान बन कर
एक ने शैतान बन कर.
होलिका दहन हो रही थी
सरयू के उस पार और
मुस्कराहट के साथ
दो बूँद आंसूं टपक चुके थे.
क्यों नहीं खेली फिरसे
किसी ने लात मारी
उस धोबी को पर
देर हो चुकी थी.
होली के राष्ट्रीय त्यौहार
होने का बीज बोया जा चुका था.

युग बीता -
पांडू कौरव पधारे
पौधे को और सींचा.
नहीं टोका किसीने
द्रौपदी को हंसने से .
वो हंसी जो
महाकाल का रूप धर आयी
चुप्पी साधे देखते रहे
महारथी चीरहरण का तमाशा.
फिर भी लात नहीं मारी किसीने.
होलिका की लपटें
शोलों सी भड़क रही थी
गूँज रहा था स्वर
योगक्षेम वहाम्यम का.
चुपचाप मुस्कुरा रही थी
सीता द्रौपदी के रूप में.

समय और गहराता गया
पौधे को और सींचा गया
तीर कमानों के युग  से
गुजरता गया समय.
अजीब से कश्मकश में
कलियुग में ठहर सा गया .
महामुर्खों के मेले ,
अब लग रहे
रोज यहाँ.
मेरा भारत महान- की
गूँज विदीर्ण कर रही
चारों दिशा.
एक लकीर नहीं खींच पाए
सदीयाँ बीत गयी
कट गए न जाने
कितने सर
बन गया नरक
जो गुलिश्तां था कल तक.
टूट रही मस्जिदें
छिन्न भिन्न हो रहे शिवाले.
स्कूल एक तक ना बन पाया
ऐसे बिखरी बिखरे चूने , ईंट और गारे .
भाषण होते विदेशों में
नेता ही नहीं अभिनेता भी
जुबान भूल गए.
अपनी राग अलापते -
सभी अजनबी.
किसी ने लात नहीं मारी
जब गोली दागी
किसीने सत्य अहिंसा के पुजारी पर .
फिर रहे गर्दभ
चहूँ ओर दिशाहीन
लादे अनमोल नगीने.
अंधे बहरे भाषण  देते ,
अट्टहास लगाते
तालियों की गड़गड़ाहट -
गूंगों से.
दुबके कोनों में  
सिहर रहे हंस -
देख बगुलों की चालें .
अंधे भागे जा रहे दिशाहीन -
आंधी की तरह पश्चिम दिशा को -
जला सभ्यता की होलिका.
महामुर्खों का सम्मलेन
रोज होता ,
रोज लग रहे विचित्र रंग -
विश्वासघात के, झूठे वादों के.
रंगीन सपनों में ,
वसुधेव कुटुम्बकम के,
राम राज्य के ,
महान भारत के.
रंगीन दुनिया ,
रंगीन दुनियावाले
मनाते होली -
पर एक दिन ही.
मैं सोच रहा था
सच कितना उगल दिया -
अनजान सही-
नन्हे से बचपन ने ,
जो अभी सो रहा ,
रख सर मेरी गोद में -
खो रहा रंगीन सपनों में.

मंजर

इतने सालों में
सब कुछ बदल सा गया .
वो पगडंडी  
जो गुजरती थी
मेरे घर के बगल से
अब विस्तृत हो गयी
किसी उफनती नदी सी
निगल रही
अपने ही किनारों को.
पगडंडी के किनारे,
खड़े हो देखता ,
रोज गोधूलि
पर अब सिर्फ
उगलता देख रहा
जहरीला धुआं
यह सर्पीला रास्ता.
लगा है रेला
अनगिनत गाड़ियों का .
अभी तो गुजरे हैं
वो दिन -
जब उस पगडंडी पर
मैं उछलता कूदता
साथियो के साथ
भागता- फिरता
उन लहलहाते खेतों के बीच
छिप जाते ,
न जाने कितने घंटे
पलछिन  की ओट.
नहर एक गुजरती थी
लहलहाते खेतों के बीच,
वहीं से बहता ,
कलकल करता पानी ,
सींचता , हरियाली बिखेरता
गुम सा हो जाता
उस पहाडी के पीछे .
अजीब सा रिश्ता
बंध गया था
हम सब के बीच.
कुछ ही सालों में
इमारतें इतनी ,
धकेल दिया
पीछे खेतों को .
छिप गयी वो नहर
इस फुटपाथ के नीचे,
जहां से गुजरता
इन इमारतों का दूषित जल .
नहर ने भी तय किया
सफ़र अपना
गंगाजल से गंदाजल का.
इन्हीं चंद सालों में.

मैं कुछ आगे बढ़ा,
उसी पगडंडी पर
यादों के सहारे, -
उस मैदान पर ,
कोने पर जिसके होता
एक छोटा शिवाला.
युग सा बीत चुका ,
विशाल भव्यमंदिर की
चारदीवारी में गूँज रहा-
यत्र , तत्र, सर्वत्र-
जनावेश का निनाद
आसपास फलफूल रहा-
अजीब सा अजगरी व्यापार.

वो मैदान जहां
भागते फिरते
तितलियों के पीछे
अनजान चुभते काँटों से.
जूनून था सवार
तितलियों को पकड़ने का.
पकड़ फिर छोड़ने का.
देखते दूर तक
उड़ती तितलियाँ,
खिलखिलाते हम सब ,
बजाते तालियाँ,
झूमते हवा के संग.
मैदान के इस कोने से,
उस कोने तक
ढूँढते फिरते एक दूसरे को
 झाड़ियों के झुरमुट में
निर्भीक , निश्चिन्त ,
निश्चिन्त, बेपरवा
उन छिपे सांप , बिच्छुओं से.
वो भी आनंद मगन ,
संग हमारे .

पर यादों के झरोखों का
वो मंजर ओझल हो गया ,
बहुमंजीली इमारतों में,
उड़ गयी तितलियाँ
खामोश किलकारियां
झिलमिलाता , टिमटिमाता
अब परेशान सा बचपन
अनजान तितलियों से
भागता फिरता दिशाहीन ,
बदहवास कारवां
अपने ही सपने बुनता -
उन्हीं के पीछे भागता
देखता-
टूटते, उजड़ते  सपनों का मंजर
किलकारी लगाता ,
खुद को बहलाता
देख नए सपनों का अम्बार .
फिर भी अनजान
अब तक उन्हीं
सांप बिच्छुओं से
जो रोष में भरे दुबके -
छिपे कचरों के डिब्बों पीछे.

कहाँ से कहाँ तक
चल पड़ा पूरा शहर ,
कुछ भी वैसा नहीं
अब छिप गया
पूरा मंजर
मेरी यादों के कोनों में.
अब क्या कहूं तुम्हें
कैसे देख सकता
बचपन तुम्हारा
थामे  उंगलियाँ मेरी  .
बिजली सी कौधी
जब मेरे बचपन ने
थामी थी , उंगलियाँ
नहीं देख पाया होगा
उस सुनसान जर्जर किले का
विस्मित , विलासमय इतिहास .
उस किले से मेरी बस्ती
और मेरी बस्ती से
तुम्हारा शहर
यही धरोहर
दिए जा रहा तुम्हे.
पर क्या बता पाओगे
मुझे
क्या सोंपोगे -
तुम अपने आने वाले बचपन को?
खिलखिलाते हो क्यों ?
देख आसमान को
सिहरन सी दौड़ गयी ,
ठहरो ज़रा सा मोड़ लो
 अपना प्रगती रथ ,
 इस प्रकृति चक्र संग .

अशहार-1


बार बार चेहरा, नजर तुम्हारा आता,
आइना ऐसा, क्यों दिखाते मुझे हो.  
मत फेंको, पत्थर मजारे मुहब्बत पर मेरी,  
छिपी रंज में चिंगारी ,
आशियाँ तुम्हारा जला ना दे .

क़त्ल कर मासूमों का ,
दुआ करने वालों, घर लौट आओ ,
यह सैलाब आंसूओं का,
डुबो तुम्हे ना दे.

जो कांटे बोये राह पर मेरी,
बुहार दिए हैं मैंने अब
अब मत बीनों इन्हें ,
बेदर्दी से कोई जख्मी तुम्हे ना कर दे.

वार खंजर के सहे उनसे,
जो दम दोस्ती का भरते रहे.
ए दोस्त छिपा लो खंजर अपना,
कातिल तुम्हे मेरा न कोई कह दे.

किसने पाया सुकून,
करके मुहब्बत किसी बावफा से.
तुम मुझसे वफ़ा ना करना,
यह मुहब्बत रुसवा तुम्हे ना कर दे.

तमाम रात अंधेरों से लड़ती रही ,
थरथराती लौ दीये की छिपा लो
अब सहर होने को ,
फूंक बावले की बुझा इसे ना दे.

दोस्तों की महफिलों से ऊब ,
मैकदे की तलाश में मन बावला
दुश्मनों के इस शहर में पूंछूं कैसे पता ,
दिल मेरा फिर कोई बहला यहाँ ना दे.

कैसे पता करून इस हुजूम में,
कौन है दुश्मन तो कौन दोस्त
कैसे नज़र मिलाऊं किससे,
फिर आस्तीन में खंजर कोई छिपा ना दे.

मैं तो अब भी खड़ा कर रहा इंतज़ार ,
तुम्ही ने दूर जा बढ़ा दिए फासले
कशिश सी हो गयी फासलों से ,
कोई वापस मुड़ इन फासलों को मिटा ना दे.

अपनी तो आदत सी रही ,
जब भी मिले बांछें खोल दिल खोल मिले
दे हाथ में खंजर घोल जुबान में मिसरी ,
अब दुनियादारी कोई सीखा ना दे.

जीवन कल

बार बार भेजता
सागर लहरों के रेले.
किये थे जिन्होंने
कभी पर्वतों को
रेतीले टीले .
अब सर धुनता सागर
जब सोख लेते ,
हर लहर
वही रेतीले टीले.
परिसीमित कर दिया
सागर का अहम्,
समय के फेर ने.

काँप गया ,
तूफ़ान का जोर
बिजली सी दौड़ा दी ,
आसमान में
जब देखा
हल्की सी हवा में
टूटते पत्ते को
मिट्टी बन ,
मजबूत करते जड़ों को.

हर महाविनाश पर ,
बोया जा रहा
बीज नया
संचार होता नवजीवन
रोक नहीं पाया कोई
निर छल, निर्मल ,
पावन-पल पल
समय की
मद्धम धार
अविरत ,
अनंत और अगाध.

महक

महक मेरे मन की -
अब तक छिपी हुई -
सीप में मोती सी.
कभी निकलने को बेकल
कभी डरी सहमी सी-
गुमसुम.
मुठ्ठी में क़ैद -
एक जुगनू बिखेरता
चमक अपनी.
बेखबर क़ैद से-
अनजान दिन से .
जाने कहाँ तक
फैले खुशबू.
जाने कब तक
रहे चमक.
ना रोके रुकती खुशबू
ना बांधे बंधती चमक.
कोई होड़ नहीं खुशबूओं में
मदमस्त बहती  
तरंगों पर हवाओं
के साथ छिप जाती
कलि में फिर
फूल से बिखरती .
चमक चमकती पेड़ों पर
अनजान अपनी ही
पहचान से.
महक मेरे मन की
बेकल-छिपी हुई...
बेकल बिखरने को ..