Monday, April 20, 2026

 Amazing Tulasi Das

रघुपतिभक्ति करत कठिनाई।
कहत सुगम करनी अपारजानै सोई जेहि बनि आई॥
जो जेहिं कला कुसलता कहँसोई सुलभ सदा सुखकारी॥
सफरी सनमुख जल प्रवाहसुरसरी बहै गज भारी॥
ज्यो सर्करा मिले सिकता महँबल तैं  कोउ बिलगावै॥
अति रसज्ञ सूच्छम पिपीलिकाबिनु प्रयास ही पावै॥
सकल दृश्य निज उदर मेलिसोवै निन्द्रा तजि जोगी॥
सोई हरिपद अनुभवै परम सुखअतिसय द्रवैत बियोगी॥
सोकमोहभयहरषदिवसनिसिदेस काल तहँ नाहीं॥
तुलसीदास यहि दसाहीनसंसय निर्मूल  जाहीं

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कवित विवेक एक नहिं मोरे, सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे।
कबि होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥
कबि होउँ नहिं बचन प्रबीनू सकल कला सब बिद्या हीनू


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