Shayaris_ Internet _2
आहिस्ता आहिस्ता खत्म होना ही है
ग़म को, या हम को ।
एक ऐसे शख्स से दिल लगा बैठी हूं
जिसे भूलना मेरे बस में नहीं और
उसे पाना मेरी किस्मत में नहीं
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खामोशी पसंद लोग है हम
बेवजह शोर नही किया करते,
जिनका दौर तूफानों मे गुजरा हो,
वो आंधियों पर गौर नही किया करते ।
वो वक्त मिले तो मिलती थी,
मैं वक्त निकाल के मिलता था ।
वो किसी काम से मिलती थी,
मेरा तो काम ही उससे मिलना था !!!.
जब समझ में आयेंगे
तब हम सिर्फ याद आयेंगे
हम जिंदगी के उस मोड पर खड़े हैं
पसंद बहुत कुछ है पर चाहिए कुछ भी नहीं।
हमें मरने तक जीना था
और हम जीने के लिए मर रहे हैं।
अगली बार मिलो तो हाथ मत मिलाना
क्योंकि तुम थाम नहीं पाओगे और
हम छोड़ नहीं पाएंगे।
सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई
देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ।
जिनके कंधों पर जिम्मेदारियां के बोझ हो..!!
उन्हें रूठने और टूटने का कोई हक नहीं होता।
डूबने वाला तो कुछ देर में डूबेगा
मगर डूबता देखने वालों को बड़ी जल्दी है।
कोई वफ़ा करे तो वफ़ा कीजिए
और ना करे तो दफा कीजिए।
मोहब्बत में हम सिर्फ उसी शख्स से हारे हैं,
जो कहता था कि हम सिर्फ तुम्हारे हैं.
तेरी खामियों से मोहब्बत की मैने
और तो मेरी मोहब्बत से मोहब्बत ना कर सका।
अगर हम समझ गए
तो फिर समझा नहीं पाओगे।
किसीको अधूरा पाने से बेहतर है
उसे मुकम्मल छोड़ दिया जाए।
ना होने का अहसास तो सबको है
मगर मौजूदकी की कद्र किसी को नहीं।
चलो आओ कायनात बाँट लेते हैं,
तुम मेरे और बाकी सब तुम्हारा।
दुआ है उसको चोट ना लगी हो,
मेरा यार गिरा है मेरी नजरों से।
जो शख़्स मुद्दतों मिरे शैदाइयों में था
आफ़त के वक़्त वो भी तमाशाइयों में था
मुस्कुराहट,
तबस्सुम,
हँसी, कहकहे !
सब के सब खो गए, अब हम बड़े हो गए।।
जिंदगी कुछ यूं गुजारी जा रही है
जैसे एक जंग हारी जा रही है
जहां पर पहले से जख्मों के निशान थे ।
फिर से वहीं पर चोट मारी जा रही है
सोचता हूं किसी से कुछ कहूं
फिर सोचता हूं किससे कहूं।
जो खोया उसका ग़म नहीं
जो पास है वो किसीसे कम नहीं !
जो नहीं है वो एक ख़्वाब हैं,
और जो है वो लाज़वाब हैं
वक्त ना लगाएं कि आपको क्या करना है
वरना वक्त यह तरेगा कि आपका क्या करना है।
कोई तो कर रहा होगा हमारी कमी को पूरा ग़ालिब
वरना वो मुझसे इतनी देर बात किए बगैर नहीं रहता।
इंसान सबसे सस्ता मोहब्बत में बिकता है
और इसे सबसे महंगी मोहब्बत he पड़ती है।।
सब मतलब की बात समझते हैं,
बात का मतलब कोई नहीं समझता।
कितनी मुश्किल के बाद टूटा है
वो एक रिश्ता जो कभी था ही नहीं।
दुनिया में दो तरह के लोग,
एक वो जो काफी अकेले होते हैं
दूसरे वो जो अकेले ही काफी होते हैं।
हम सिर्फ अच्छे लोगों को जानते हैं
क्योंकि बुरे लोग हमे अच्छी तरह जानते हैं।
ज़ाया ना कर अपने अल्फ़ाज़ हर किसी के लिये....
बस ख़ामोश रह कर देख तुझे समझता कौन है.
रूठ जाते हो तो कुछ और हसीन लगते हो,
हमने बस यही सोच कर तुम्हे खफा रखा।
रूठी बेगम उड़ते बर्तन, सब नजारे देखेंगे,
घर में चांद लाने वाले, दिन में तारे देखेंगे
नैरंगी-ए-सियासत-ए-दौराँ तो देखिए
मंज़िल उन्हें मिली जो शरीक-ए-सफ़र न थे
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उनकी नज़रो में फर्क अब भी नहीं,
पहले मुड़ के देखते थे, अब देख के मुड़ जाते हैं।
कुछ देर की खामोशी है , फिर शोर आएगा,
तुहारा सिर्फ वक्त आया है, हमारा दौर आएगा ।
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दिल बहुत तकलीफ में है और
तकलीफ देने वाला दिल में हैं।
बहुत सारे थे मेरे अपने इस दुनिया मे,
फिर इश्क़ हुआ और हम लावारिश हो गए
तुमसे मिलना जरूरी नहीं,
तुम्हारा मिल जाना जरूरी है।
मेरी बेबसी तो देखो फराज
वो मुझसे रोया किसी और के लिए।
गरज ये नहीं की दीया तेरा हो या मेरा हो,
बुझाने बालो की खवाइश है, की बस अंधेरा हो।
नींद आएगी तो इस कदर सोएंगे
हमें जगाने के लिए लोग रोएंगे..!
तुझको पाने की तमन्ना में गुजारी होती।
एक जान और भी होती तो वो तुम्हारी होती।
अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को
मैं ने औरों से सुना है कि परेशान हूँ मैं।
बहुत देर लगी हमें ये समझने में।
कि बहुत फर्क है मोहब्बत कहने और करने में.
सवाल जहर का नहीं था, वो तो मैं पी गया!
मगर तकलीफ लोगों को तब हुई, जब मैं जी गया!
ये दुनिया सपेरों की बस्ती है, रिश्ते बनाकर डसती है..
एक जनाजे के खातिर सारा जहां निकला
एक वो ना निकला जिसके खातिर जनाजा निकला.
मगस को बाग़ में जाने न दीजो
कि नाहक़ ख़ून परवाने का होगा
ये जो पत्थर के हो चुके हैं,
अपने हिस्से का रो चुके
मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में
रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर ।
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जिनसे बातें खत्म ही नहीं होती थीं,
उनसे बात ही खत्म हो गई।
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हमारे कुछ गुनाहों की सज़ा भी साथ चलती है
हम अब तन्हा नहीं चलते दवा भी साथ चलती है
अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है।
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में इसलिए भी जमाने में प्यारा हूं
मुझे पता है कहां कितना झूठ बोलना है।
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दूरी हुई तो उनसे, करीब और हम हुए
ये कैसे फ़ासले थे, जो बढ़ने से कम हुए।
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धोखा वफ़ा की राह में खाएं है हम ज़रूर,
लेकिन किसीके साथ में धोखा नहीं किया..
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