Monday, April 20, 2026

 Papaji's poems

बहरी खुशबू

किस-किस को दें

भीख

यहां तो हर एक

लखपति नजर आता।

यारों अब किस-किस को दें

सीख हर कोई तो पी एचडी नजर आता।

अपनी जेब में रखो

दस पैसे, चवन्नी

अठन्नी तक,

नहीं चलती, आज के बाजार में।

रुपल्ली  दो रुपल्ली  भी,

भरी है लोगों की जेब में।

पांच सौ

हजार तक की गड्डी, से अंधे हो

क्या नजर नहीं आता ?

ले जाओ -

अपने साथ

सारा कुछ अनुभव

सबके लिए मानक है

अपनी बात,

बहरे हो, सुनाई नहीं देता

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चिड़िया

वह

कितनी छोटी-छोटी चिड़िया

चुगती दाना और

फुदकती, मटकती

और फुर्र से

पहुंचती उस टहनी पर।

 

और आज अठखेलियों का करती

नन्ही गौरैया

कैसे चहक रही

बहक रही

और मुझे

स्तब्ध कर रही।

सूरज की पहली किरण संग

नन्ही चोंच से

देखो - देखो

कैसे वह लड़ रही !

थकती नहीं

दाना चुग

फिर पानी

बूंद भर रही।

कैसी अल्हड़ यह

हवा को

उड़ते - उड़ते पूँछ से

पीछे छोड़ आगे बढ़ रही।

कुछ अकेली

कुछ जोड़े में

और सैकड़ो झुंड में

उड़ रही, उड़ रह।

कहां, क्यों, कब ?

प्रश्न कोई भी हो

अवांतर है लगता है उन्हें

बस उड़ रही,

उड़ना है,

वे सब उड़ रही। 

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चिराग

इन चिरागों ने

जलना है सीखा  अभी,

आप आंचल में रख

कर इन्हें

कुछ और नेहा तो दीजिए।

 

यह अमानत है मुल्क की

अंधेरा बहुत है,

इनकी जरूरत ज्यादा

इन्हें रोशन होने दीजिये।

 

आपने  ही सींचा है इनको

अपने खून - पसीने से

अब ये  क्यारी से बयार में

खुशबू केसर की लीजिए।

 

इस वक्त दौर है जलजला जानवरों का

इस बीहड़ में चलना

कुछ आसान कीजिए।

इनको लफ्ज़ दो - चार अपने लबों से

आप ही इंसानियत का सिखा दीजिए।

 

इस जमाने में चलना सीखा

इन्होंने आपसे कुछ कदम अभी और चलना,

कुछ कायदे इन्हें बता दीजि।

आप ही इन कदमों को राह दिखा दीजिये।

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कल तक जो

गोद से

उतरते ना थे

पानी पीने तक,

अब महीने दो महीने की

दे रहे नोटिस -

रहे हैं

प्रोग्राम बना रहे हैं!

 

कल तक

सांस लेने या

दिल धड़कने की तरह

आसपास करते रहते

उछल कूद।

अब महीने दो महीने पूर्व

तैयारियां हो रही

उनकी अगवानी की। 

 

धूल, माटी,

कहीं पांव में ठोकर

या कहीं उंगली की चोट

वरना पता भी नहीं चलता

कि घर में हैं ट्यूशन

या फिर स्कूल के कमरे में

अब महीने दो महीने पहले

बनने लगा

मिनट टू  मिनट प्रोग्राम

चौदहों का मिलक।

 

वैसे ना कटे हैं

ना कहीं फटे हैं

मगर दूर  - बहुत दूर

अब जा बसे हैं।

घर बार रोजी-रोटी

पढ़ाई - लिखाई सब ठीक है।

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प्रतीक्षा

मैंने प्रतीक्षा की

मुंह खुलेगा

पर अब तक होंठ

सिले ही रह गए

फिर भी

मिला बहुत कुछ,

कैसे कहूं कि रह गया

भर गया भीतर ही भीतर

शब्द सिना रह गया

रीता ही रीता !

 

आज भी देखता

कुछ झरे एक शब्द

बस,

वही होगी जीवन की

सारी सफलता !

कहीं कुछ रह गई

कमी मेरे कहने में

वरना क्या कमी है

तुम्हारे पास शब्दों की ?

 

मैंने लिखे

सारे शब्द तुम्हारे लिए

फिर भी कहीं रह गए अनछुए !

 

हवा ही बही

इस ओर 

झोकों में उलटते गए !

और हम खड़े-खड़े प्रतीक्षा कर रहे !

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साथ साथ

 

साथ साथ रहना

होता नहीं साथ जीना।

बहार में भी

पतझड़ सा मौन

बोलो यह कैसा जीना ?

 

शायद यही है नियति

कि मेरी भाषा

और तुम्हारे बोल

आज भी भटकते फिर रहे,

कब तक भटकना ?

 

भरे पूरे सारे सवाल ,

कहीं कोई गुंजाइश नहीं उत्तरों की।

चलते-चलते देख लें

आंखों में झलकते बवाल।

वह सब सह का शोर है

पल भर में शांत होगा

फिर क्यों जबरन रोकते

अपने यह जिंदगी के मलाल ?

अरे, आओ थोड़ा सा रह गया

बस कुछ तो मंजूर कर लो ,

साथ रहना और साथ जीना !

 

ताकि रुखसत हो सके

लेकर एक अहसास

सीखा था हमने भी

तुमसे, तुम्हारे साथ जीना ,

तुम्हारे साथ जीना।

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दर्शन

यहां तक

बँटे थे ,

आगे

सब एक।

 

पहुँच

कागज पर

कुछ अक्षर

देखें

ठिकाना गया।

क्या बात है

कोई लंबा

सीरियल टीवी

है यह जिंदगी।

 

मिठास के

नाम पर

दे रहे सेकरीन।

 

अचानक

फोन आया

वह नहीं रह।

 

 

भोपाल की भोर

 

रात भर बरसते रहे

अच्छा हुआ

वरना परेशान

दिन भर।

 

अचानक

झूले - सा नीचे

ऊपर फिर

झटके में ऊपर उठ

इतने ऊंचे चलने वाले

इतना सा खतरा तो झेलना ही होगा

 

 

बहस

आप चल रहे

नहीं

मैं खड़ा

चल तो आप रहे।

प्रेम

प्रेम तो

भावुकता है

आप में आने के

बाद बात करें

 

सपने में

चल रहे आप

जगा दीजिए।

 

प्रेम में

ठोकर कहाँ

धरती से

चलते ऊपर।

 

प्रेम ईथर

हवा से पतला ,

दिखेगा कैसे

 

प्रेम आदमी से

नहीं

आदमी करता

नहीं।

 

प्रेम के

फूल - फल

फिर भी यूं

महकता।

 

प्रेम के

पांव चक्के

फिर भी यूं

फिरता।

 

ऑंसू

 

भरा है सागर ,

छूते ही

लहर पर लहर

ऑंसू उभरते।

बात-बात

पर आंसू ,

आदत नहीं

दर्द होता

इन बातों पर।

 

आपकी बातों पर

आती है हंसी

क्यों रोने की

नहीं कोई बात।

 

दर्द

कितना है दर्द

सीने में ,

ऑंसू क्यों उमड़े

आँख में।

 

ठिकाना बदल लिया

ऑंसू और

हॅंसी के ठहाके कान में

ऑंसू  आँख में

 

 

जीवन क्या है

एक सफर

कुछ दूर आना और जाना है

कभी ठिकाना कभी से ठिकाना है।

यहां कोई अपना कोई बेगाना है

हमें कोई रोना और कोई गाना है

दोस्तों बस चलने हमें भी निभाना है

आज मस्ती भरे बोल सुनना सुनना है।

 

गोवा में

 

अब लोगों को

उम्र बात बताने पर

लग जाती नजर !

 

आज तक

ठग,  बेईमान, धोखेबाज रहा

अचानक

बन गया रक्षक।

 

कहो , एक-एक

फोन सबके आए

बदल गई

आवाज !

 

बरसों बीत गए

वादे सुनते - सुनते

और भी

अभी वक्त बाकी है !

 

तुमने साथ तो दे दिया

पर और बहुत कुछ

रह गया

अनदिया  

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चल

लोग - बाग

क्यों रुकेंगे यहाँ

एक बीमार के लिए।

कारवां चलते चले ,

रुका सा रह लिए।

चल उठ,

अभी तुझे जाना है

पता नहीं कितनी दूर ,

पीछे रह गया अकेला।

 

तुझे नहीं चलना भीड़ में,

मत गिन अभी से

दिन, माह बरस।

तेरी राह सूनी अब भी

चल, चल, चला , चल अकेला !!

 

तू अकेला कहाँ ?

जब जुड़ा जमाने से  ,

सब तेरे साथ हैं ,

आगे - पीछे होना

महज वक्त की बात ,

नहीं तू अकेला !

 

चल मनुवा

मत हो उदास।

वक्त तो गूंगा है ,

यह बड़बोले नहीं

वक्त की कोई आवाज

 

छोड़ो उनकी बात

जरा सी आँच में

पिघल रहे, ये लोग।

तुझे इस सर्द - गरम से

क्या लेना, क्या देना ?

तू क्यों इन छोटी-छोटी बातों में

कदम थाम रुक गया ?

चल उठ,

चल उठ

कोई नहीं जगाने वाला

जगाने वाले तो सो गए

या चले गए बहुत दूर

छोड़कर यह मेला।

 

अपने को मत समझ

बड़ा या छोटा इस भीड़ से

तू अपने मकसद में है अकेला।

बस ,

उम्मीद मत रख

किसी से जो तुझे देखे।

बस

चला चल, चला चल , अकेला।

बची हुई तीलियों और मोमबत्ती के

भरोसे लड़ोगे अंधेरे से ?

अभी तो चांद - सूरज हैं ,

उन्हें भरोसे में कर, चला चल, चला चल

 

बांधकर पत्थर में

शब्द तेरे छोड़ना जा

कुछ बचें और कुछ बचें

तुझे क्या ,

तू तो चल कुछ शब्द लिखता जा।

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तुम बिन

 

चांदी सी रात

सोने से दिन

कितने सूने - सूखे

लगते हैं तुम बिन।

 

बीत गए दिन

बीती हैं रात

सूखी है धरती

प्यासी, बिन बरसात।

 

बैठे हैं भीड़ में गुमसुम

नहीं कोई सुख ,

नहीं कोई गम।

फिर भी कोफ्त में भरे

बैठे हैं अकेले हम।

 

जब भी बोलें -

होठों पर बोल आते।

आपके कान सुनते

अनसुनी कर जाते।

 

हम बाट जोहते रहते

अनकही कथा भी गुनते

पर मन के तालों से

कुछ महकते झोंके आते।।

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अपनी राह जमाना चल रहा

 

अब तो बात - बात पर

बह आता पानी खारा

मानो कोई भरे तालाब का

पुटता कहीं दरक गया

थोड़ा सा।

 

क्या करे आदमी

हवा में ही लोचापन भर गया ,

कहाँ तक रोकेगा

मीठापन जबान में ,

यह पानी ही पानी बह रहा।

 

कभी तो चल नहीं पाया

आदमी सलीके से

और ना बोल पाया कायदे से।

आजकल ठोकर ही लगी ,

यह लाजमी था ,

उफ़ को सुनेगा कौन

 क्यों अब कराह !

 

बहुत फिर चुका ,

कम से कम, चुप बैठ,

हवा को तो बिगाड़ नहीं देगा तू,

बड़ा बहम  रखा पचास बरस

कि  शब्दों से कुछ जोड़ लेगा ,

शब्दों में मोह लगा ,

लोग समझदार हो गए।

शब्दों के भुलावे उतर गए।

तुझे भी समझ कर शब्दों का सौदागर

अपनी राह जमाना चल रहा।

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