जब भी समुन्दर को देखता -
सिहरन सी दौड़ जाती,
रश्क सा होने लगता,
उमड़ फैलती लहरों को देख ।
रंग समुद्र के – बिखराती किनारों पर
नाराज - तो सीपों से भरी लहरें
एक आध मोती से खुशियाँ लुटाती ।
एक के बाद एक, अगिनत
किनारे तक आती फिर ओझल ।
देख रहा - मंडराते पंछियों का झुंड
लहरों को देख, गोता लगाते
मछलियाँ पकड़ - फिर ऊपर ।
सीपी हो या मोती - किनारे ही धरे रह जाते ।
सुना है मैंने, अलग ही दुनिया बसा रखी,
इसने अपने अंदर ।
पानी खारा ही हो, पर मेरी दुनिया से नहीं अलग
एक दूसरे से हम नहीं परे ।
लहरों के साथ-साथ, किनारे – किनारे,
इस रेत पर, मैं आगे बढ़ता
पदचिन्ह मेरे देख रहा
ओझल होते - लहरों से
कभी रोष में, तो कभी खिलखलाते ।
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08 Jan 2026