अहं
अब तराशने लगे
नदियों को पत्थर ।
आजाद जिन्हें किया
पहाड़ों की कैद से ।
कतरा इनसे - किनारे बहने लगे
नए रास्ते पर, कल - कल करता पानी ।
अब टकराने लगे पत्ते
बहती हवाओं से ।
बचाया जिन्हें- धूप बारिशों से
हौले से अब कतरा - निकल जाता
एक झोंका ।
सब कुछ बदल जाता
प्रकृति की गोद में
ढलते उगते सूरज संग,
चाँद, सितारे भी जगमगाते
नदियों को मिलना सागर संग
पवन को ले चलना खशबूओं को ।
मुस्कुराता देखता
ठोकरों में पड़े पत्थर
मिट्टी में मिलते पत्ते
अस्मिता अपनी मिटा रहे
पहचान बनाने के अहं ।
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26/12/2025
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