Thursday, January 8, 2026

 

अहं

अब तराशने लगे

नदियों को पत्थर

आजाद जिन्हें किया

पहाड़ों की कैद से ।

कतरा इनसे - किनारे बहने लगे

नए रास्ते पर, कल - कल करता पानी ।

 

अब टकराने लगे पत्ते

बहती हवाओं से ।

बचाया जिन्हें- धूप बारिशों से

हौले से अब कतरा - निकल जाता

एक झोंका ।

 

सब कुछ बदल जाता

प्रकृति की गोद में

ढलते उगते सूरज संग,

चाँद, सितारे भी जगमगाते

नदियों को मिलना सागर संग

पवन को ले चलना खशबूओं को ।

 

मुस्कुराता देखता

ठोकरों में पड़े पत्थर

मिट्टी में मिलते पत्ते

अस्मिता अपनी मिटा रहे

पहचान बनाने के अहं । 

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26/12/2025

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