Saturday, December 20, 2025

 मचलता मन 

दूर पहाड़ों को देख
मचलने लगा मन।
चल पड़ा धुन में अपनी
दिल में एक अलख लगन।

घुमावदार रास्ते,
दलदली जमीन कहीं
तो कहीं पथरीली कांटों भरी झाड़ियां।
छलनी कर देती।
पर पहाड़ी की चोटी
बार-बार मन को लुभा रही।
मैं चलता  जाता
रास्ते अपने ही बनाता जा रहा,
अनजान - सियाल, बिच्छू, सांपों से।

अब ऊपर चढ़ना -
कोई पगडंडी नजर नहीं आ रही
वो जो दूर से - दिख रही थी  पहाड़ी अद्भुत
अब विकराल, भयावह ,
पत्थरों और पेड़ों का समूह।  
आवाजें  गूंज रही झरनों की
पर नजर में एक भी नहीं।
आवाजें  हिंसक जानवरों की घुल मिल जा रही
पंछियों की चहचहाट में।  
हवाओं की सरसराहट संग।  

थोड़ा सा सुस्ता लूँ ,
मन को समझा लूँ
जो दूर से दिख रही - अद्भुत
अब देख उसे - क्यों त्रस्।
मेरी छाया, होने लगी लंबी मुझसे ,
शायद शाम  होने को आई।
हौले - हौले कदम बढ़ाता,
कुछ देर - थक साँसें भरता
चहुँओर अपने निहोराता
अजीब सी खामोशी-  चुपके से कहती ,
थोड़ा और।
फिर कदम उठते - वो छवि जो
दूर से देख मन में उंकेरी
धूमिल होती गई।
परत एक नई - उस पर बस गयी ।
चाल धीमी हो गई - पर फासले भी ज्यादा नहीं रहे।
चलता रहा - कुछ और,
साँझ  से रात - पर रुके नहीं कदम मेरे।
पत्थरों को कभी थामता ,
कभी जड़ों को ,
तो कभी बेलों को।  
पहुँच ही गया आखिर चोटी तक
अब और कदम उठाए नहीं उठाते।  
एक पत्थर पर - सुस्ताने बैठा
अचानक आँखें - दूर क्षितिज पर
टिमटिमाते से नजर आ रहे
दूर-सुदूर गाँव।
भोर भी होने लगी,
अब साफ नजर आते
लहलहाते खेत - हरे।
उतर गई थकान सारी,-चारों तरफ
अद्भुत नजार।  
फिर मचलने लगा मन -
देख टिमटिमाते गांव
हरे-भरे खेतों की ओट से - लेने सौंधी मिट्टी की खुशब।

पर - यह क्या देख रहा -
एक बिंदु काली सी - पहाड़ी की तलहटी प।
एक और सफर में - इस चोटी पर।
उलझन में मन -
पैर  बढ़ाऊँ -  या यहीं ठहर जाऊ।
-----------------
Dec  २०/२०२५

No comments:

Post a Comment