Papaji poems
चिराग
इन चिरागों ने
जलना
है सीखा अभी,
आप आंचल में रख
कर इन्हें
कुछ
और नेहा तो दीजिए।
यह अमानत है मुल्क की
अंधेरा
बहुत है,
इनकी
जरूरत ज्यादा
इन्हें
रोशन होने दीजिये।
आपने ही
सींचा है इनको
अपने
खून - पसीने से
अब ये क्यारी
से बयार में
खुशबू
केसर की लीजिए।
इस वक्त दौर है
जलजला जानवरों का
इस बीहड़ में चलना
कुछ
आसान कीजिए।
इनको
लफ्ज़ दो - चार अपने
लबों से
आप ही इंसानियत का
सिखा दीजिए।
इस जमाने में चलना सीखा
इन्होंने
आपसे कुछ कदम अभी
और चलना,
कुछ
कायदे इन्हें बता दीजि।
आप ही इन कदमों
को राह दिखा दीजिये।
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कल
तक
कल तक जो
गोद
से
उतरते
ना थे
पानी
पीने तक,
अब महीने दो महीने की
दे रहे नोटिस -
आ रहे हैं
प्रोग्राम
बना रहे हैं!
कल तक
सांस
लेने या
दिल
धड़कने की तरह
आसपास
करते रहते
उछल
कूद।
अब महीने दो महीने पूर्व
तैयारियां
हो रही
उनकी
अगवानी की।
धूल,
माटी,
कहीं
पांव में ठोकर
या कहीं उंगली की
चोट
वरना
पता भी नहीं चलता
कि घर में हैं
ट्यूशन
या फिर स्कूल के
कमरे में
अब महीने दो महीने पहले
बनने
लगा
मिनट
टू मिनट
प्रोग्राम
चौदहों
का मिलक।
वैसे
ना कटे हैं
ना कहीं फटे हैं
मगर
दूर - बहुत
दूर
अब जा बसे हैं।
घर बार रोजी-रोटी
पढ़ाई
- लिखाई सब ठीक है।
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