Tuesday, December 9, 2025

 

समय के पार

 

बचपन में देखा मैंने

बैलगाड़ी का पगडंडियों से गुजरना।

वो बैलों के गले की घंटियाँ

सुनाई देती थी दूर दराज मोड़ों से।

रोक साईकिल अपनी

रास्ता देता गुजर जाने उनको।

देर तक देखता

एक गुबार हल्का सा धूल का।

 

बीतते समय के साथ

साईकिल छूटी स्कूटर आया।

बैलगाड़ी ने किया किनारा

मोटर कारें दौड़ी और

छिपा दी पगडंडियाँ

लंबी चौड़ी सड़कों ने

किनारा अब भी कर देता

देखता जब उगलता धूंआ जहरीला।

समा जाता, रग रग में मेरे

भाग रहा समय के साथ

ना धूल ना धूँआ

बस बदहवास।

 

आज- एक युग सा बीत गया

जमीन से ना जाने कितने ऊपर

रूई से उड़ रहे बादल इर्द गिर्द

ना कोई सड़क ना ही पगडंडी

ना कोई धूल ना ही वो घंटी

बस देख रहा नीचे

इस विमान से नीचे

खेत खलिहान, नदी तालाब

रंग बिरंगी बिछी एक चादर

बिंदु मात्र नज़र रहे सब कुछ।

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