Tuesday, December 9, 2025

  Papaji poems

प्रतीक्षा

मैंने प्रतीक्षा की

मुंह खुलेगा

पर अब तक होंठ

सिले ही रह गए

फिर भी

मिला बहुत कुछ,

कैसे कहूं कि रह गया

भर गया भीतर ही भीतर

शब्द सिना रह गया

रीता ही रीता !

 

आज भी देखता

कुछ झरे एक शब्द

बस,

वही होगी जीवन की

सारी सफलता !

कहीं कुछ रह गई

कमी मेरे कहने में

वरना क्या कमी है

तुम्हारे पास शब्दों की ?

 

मैंने लिखे

सारे शब्द तुम्हारे लिए

फिर भी कहीं रह गए अनछुए !

 

हवा ही बही

इस ओर 

झोकों में उलटते गए !

और हम खड़े-खड़े प्रतीक्षा कर रहे !

-------------

 

साथ साथ

 

साथ साथ रहना

होता नहीं साथ जीना।

बहार में भी

पतझड़ सा मौन

बोलो यह कैसा जीना ?

 

शायद यही है नियति

कि मेरी भाषा

और तुम्हारे बोल

आज भी भटकते फिर रहे,

कब तक भटकना ?

 

भरे पूरे सारे सवाल ,

कहीं कोई गुंजाइश नहीं उत्तरों की।

चलते-चलते देख लें

आंखों में झलकते बवाल।

वह सब सह का शोर है

पल भर में शांत होगा

फिर क्यों जबरन रोकते

अपने यह जिंदगी के मलाल ?

अरे, आओ थोड़ा सा रह गया

बस कुछ तो मंजूर कर लो ,

साथ रहना और साथ जीना !

 

ताकि रुखसत हो सके

लेकर एक अहसास

सीखा था हमने भी

तुमसे, तुम्हारे साथ जीना ,

तुम्हारे साथ जीना।

---------------

No comments:

Post a Comment