Tuesday, December 9, 2025

 Poems by Papaji


बहरी खुशबू

किस-किस को दें

भीख

यहां तो हर एक

लखपति नजर आता।

यारों अब किस-किस को दें

सीख हर कोई तो पी एचडी नजर आता।

अपनी जेब में रखो

दस पैसे, चवन्नी

अठन्नी तक,

नहीं चलती, आज के बाजार में।

रुपल्ली  दो रुपल्ली  भी,

भरी है लोगों की जेब में।

पांच सौ

हजार तक की गड्डी, से अंधे हो

क्या नजर नहीं आता ?

ले जाओ -

अपने साथ

सारा कुछ अनुभव

सबके लिए मानक है

अपनी बात,

बहरे हो, सुनाई नहीं देता

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चिड़िया

वह

कितनी छोटी-छोटी चिड़िया

चुगती दाना और

फुदकती, मटकती

और फुर्र से

पहुंचती उस टहनी पर।

 

और आज अठखेलियों का करती

नन्ही गौरैया

कैसे चहक रही

बहक रही

और मुझे

स्तब्ध कर रही।

सूरज की पहली किरण संग

नन्ही चोंच से

देखो - देखो

कैसे वह लड़ रही !

थकती नहीं

दाना चुग

फिर पानी

बूंद भर रही।

कैसी अल्हड़ यह

हवा को

उड़ते - उड़ते पूँछ से

पीछे छोड़ आगे बढ़ रही।

कुछ अकेली

कुछ जोड़े में

और सैकड़ो झुंड में

उड़ रही, उड़ रह।

कहां, क्यों, कब ?

प्रश्न कोई भी हो

अवांतर है लगता है उन्हें

बस उड़ रही,

उड़ना है,

वे सब उड़ रही। 

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