Papaji poems
तुम
बिन
चांदी
सी रात
सोने
से दिन
कितने
सूने - सूखे
लगते
हैं तुम बिन।
बीत
गए दिन
बीती
हैं रात
सूखी
है धरती
प्यासी,
बिन बरसात।
बैठे
हैं भीड़ में गुमसुम
नहीं
कोई सुख ,
नहीं
कोई गम।
फिर
भी कोफ्त में भरे
बैठे
हैं अकेले हम।
जब भी बोलें -
होठों
पर बोल आते।
आपके
कान सुनते
अनसुनी
कर जाते।
हम बाट जोहते रहते
अनकही
कथा भी गुनते
पर मन के तालों
से
कुछ
महकते झोंके आते।।
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अपनी
राह जमाना चल रहा
अब तो बात - बात
पर
बह आता पानी खारा
मानो
कोई भरे तालाब का
पुटता
कहीं दरक गया
थोड़ा
सा।
क्या
करे आदमी
हवा
में ही लोचापन भर
गया ,
कहाँ
तक रोकेगा
मीठापन
जबान में ,
यह पानी ही पानी
बह रहा।
कभी
तो चल नहीं पाया
आदमी
सलीके से
और ना बोल पाया
कायदे से।
आजकल
ठोकर ही लगी ,
यह लाजमी था ,
उफ़ को सुनेगा कौन
क्यों अब कराह !
बहुत
फिर चुका ,
कम से कम, चुप
बैठ,
हवा
को तो बिगाड़ नहीं
देगा तू,
बड़ा
बहम रखा
पचास बरस
कि शब्दों
से कुछ जोड़ लेगा
,
शब्दों
में मोह लगा ,
लोग
समझदार हो गए।
शब्दों
के भुलावे उतर गए।
तुझे
भी समझ कर शब्दों
का सौदागर
अपनी
राह जमाना चल रहा।
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