Tuesday, December 9, 2025

  Papaji poems


तुम बिन

 

चांदी सी रात

सोने से दिन

कितने सूने - सूखे

लगते हैं तुम बिन।

 

बीत गए दिन

बीती हैं रात

सूखी है धरती

प्यासी, बिन बरसात।

 

बैठे हैं भीड़ में गुमसुम

नहीं कोई सुख ,

नहीं कोई गम।

फिर भी कोफ्त में भरे

बैठे हैं अकेले हम।

 

जब भी बोलें -

होठों पर बोल आते।

आपके कान सुनते

अनसुनी कर जाते।

 

हम बाट जोहते रहते

अनकही कथा भी गुनते

पर मन के तालों से

कुछ महकते झोंके आते।।

------------

अपनी राह जमाना चल रहा

 

अब तो बात - बात पर

बह आता पानी खारा

मानो कोई भरे तालाब का

पुटता कहीं दरक गया

थोड़ा सा।

 

क्या करे आदमी

हवा में ही लोचापन भर गया ,

कहाँ तक रोकेगा

मीठापन जबान में ,

यह पानी ही पानी बह रहा।

 

कभी तो चल नहीं पाया

आदमी सलीके से

और ना बोल पाया कायदे से।

आजकल ठोकर ही लगी ,

यह लाजमी था ,

उफ़ को सुनेगा कौन

 क्यों अब कराह !

 

बहुत फिर चुका ,

कम से कम, चुप बैठ,

हवा को तो बिगाड़ नहीं देगा तू,

बड़ा बहम  रखा पचास बरस

कि  शब्दों से कुछ जोड़ लेगा ,

शब्दों में मोह लगा ,

लोग समझदार हो गए।

शब्दों के भुलावे उतर गए।

तुझे भी समझ कर शब्दों का सौदागर

अपनी राह जमाना चल रहा।

No comments:

Post a Comment