Papaji poems
दर्द
कितना
है दर्द
सीने
में ,
ऑंसू
क्यों उमड़े
आँख
में।
ठिकाना
बदल लिया
ऑंसू
और
हॅंसी
के ठहाके कान में
ऑंसू आँख
में
जीवन
क्या है
एक सफर
कुछ
दूर आना और जाना
है
कभी
ठिकाना कभी से ठिकाना
है।
यहां
कोई अपना कोई बेगाना
है
हमें
कोई रोना और कोई
गाना है ।
दोस्तों
बस चलने हमें भी
निभाना है
आज मस्ती भरे बोल सुनना
सुनना है।
गोवा
में
अब लोगों को
उम्र
बात बताने पर
लग जाती नजर !
आज तक
ठग, बेईमान,
धोखेबाज रहा
अचानक
बन गया रक्षक।
कहो
, एक-एक
फोन
सबके आए
बदल
गई
आवाज
!
बरसों
बीत गए
वादे
सुनते - सुनते
और भी
अभी
वक्त बाकी है !
तुमने
साथ तो दे दिया
पर और बहुत कुछ
रह गया
अनदिया
।
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चल
लोग
- बाग
क्यों
रुकेंगे यहाँ
एक बीमार के लिए।
कारवां
चलते चले ,
रुका
सा रह लिए।
चल उठ,
अभी
तुझे जाना है
पता
नहीं कितनी दूर ,
पीछे
रह गया अकेला।
तुझे
नहीं चलना भीड़ में,
मत गिन अभी से
दिन,
माह बरस।
तेरी
राह सूनी अब भी
चल,
चल, चला , चल अकेला !!
तू अकेला कहाँ ?
जब जुड़ा जमाने से ,
सब तेरे साथ हैं
,
आगे
- पीछे होना
महज
वक्त की बात ,
नहीं
तू अकेला !
चल मनुवा
मत हो उदास।
वक्त
तो गूंगा है ,
यह बड़बोले नहीं
वक्त
की कोई आवाज ।
छोड़ो
उनकी बात
जरा
सी आँच में
पिघल
रहे, ये लोग।
तुझे
इस सर्द - गरम से
क्या
लेना, क्या देना ?
तू क्यों इन छोटी-छोटी
बातों में
कदम
थाम रुक गया ?
चल उठ,
चल उठ
कोई
नहीं जगाने वाला
जगाने
वाले तो सो गए
या चले गए बहुत
दूर
छोड़कर
यह मेला।
अपने
को मत समझ
बड़ा
या छोटा इस भीड़
से
तू अपने मकसद में
है अकेला।
बस
,
उम्मीद
मत रख
किसी
से जो तुझे देखे।
बस
चला
चल, चला चल , अकेला।
बची
हुई तीलियों और मोमबत्ती के
भरोसे
लड़ोगे अंधेरे से ?
अभी
तो चांद - सूरज हैं ,
उन्हें
भरोसे में कर, चला
चल, चला चल ।
बांधकर
पत्थर में
शब्द
तेरे छोड़ना जा
कुछ
बचें और कुछ बचें
तुझे
क्या ,
तू तो चल कुछ
शब्द लिखता जा।
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