Thursday, January 8, 2026

जब भी समुन्दर को देखता - 

सिहरन सी दौड़ जाती,

रश्क सा होने लगता,

उमड़ फैलती लहरों को देख ।

रंग समुद्र के बिखराती  किनारों पर

नाराज - तो सीपों से भरी लहरें

एक आध मोती से खुशियाँ लुटाती ।

 

एक के बाद एक, अगिनत

किनारे तक आती फिर ओझल ।

देख रहा - मंडराते पंछियों का झुंड

लहरों को देख, गोता लगाते

मछलियाँ पकड़ - फिर ऊपर

सीपी हो या मोती - किनारे ही धरे रह जाते ।

 

सुना है मैंने, अलग ही दुनिया बसा रखी,

इसने अपने अंदर ।

पानी खारा ही हो, पर मेरी दुनिया से नहीं अलग

एक दूसरे से हम नहीं परे ।

लहरों के साथ-साथ, किनारे किनारे,

इस रेत पर, मैं आगे बढ़ता

पदचिन्ह मेरे देख रहा

ओझल होते - लहरों से

कभी रोष में, तो कभी खिलखलाते

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08 Jan 2026


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