Thursday, January 8, 2026

 

प्रतीक्षा

 

जाने कब से बसे हैं

यह तीन मेरे अंदर

कोई किसी से अनभिज्ञ नहीं

फिर भी सबसे अलग ।

 

निकल जाता एक, सुबह-सुबह

नाँव अपनी लिए - बीच समुन्दर

जाल डाल समुद्र में

बाँसुरी बजाता, डगमगाती नाँव पर

मछलियां चुन, किनारे शाम तक

 

दूसरा चल पड़ता, भरी - भोर सुबह

मस्त अल्हड़ सा बहती पवन संग

कोई मंजिल नहीं बस खुशबूओं से

लहराता बहता झोंके हवाओं के

पर लौटता वह - भी रात देर तक

 

तीसरा जाने कब से निकला -  टीस एक छोड़ गया

उस दूर- सुदूर पर्वत कंदरा में

जंगलों के पार - अब तक बैठा आंखें मूंद

गुफा की कोट में ।

सारी आवाजों से ओझल

खुद को खो जाने किसकी लगन ।

 

मैं इस - सागर किनारे

मिलता सबसे - सब बतियाते

इंतजार में तीसरे के फिर सब गुमसुम,

दूर आकाश देखते टिमटिमाते सितारे

कोई टूट रहा, तो कोई झिलमिल रहा 

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06/01/2025

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