प्रतीक्षा
जाने कब से बसे हैं
यह तीन मेरे अंदर
कोई किसी से अनभिज्ञ नहीं
फिर भी सबसे अलग ।
निकल जाता एक, सुबह-सुबह
नाँव अपनी लिए - बीच समुन्दर
जाल डाल समुद्र में
बाँसुरी बजाता, डगमगाती नाँव पर
मछलियां चुन, किनारे शाम तक ।
दूसरा चल पड़ता, भरी - भोर सुबह
मस्त अल्हड़ सा बहती पवन संग
कोई मंजिल नहीं बस खुशबूओं से
लहराता बहता झोंके हवाओं के
पर लौटता वह - भी रात देर तक ।
तीसरा जाने कब से निकला - टीस एक छोड़ गया
उस दूर- सुदूर पर्वत कंदरा में
जंगलों के पार - अब तक बैठा आंखें मूंद
गुफा की कोट में ।
सारी आवाजों से ओझल –
खुद को खो जाने किसकी लगन ।
मैं इस - सागर किनारे
मिलता सबसे - सब बतियाते
इंतजार में तीसरे के – फिर सब गुमसुम,
दूर आकाश देखते टिमटिमाते सितारे
कोई टूट रहा, तो कोई झिलमिल रहा ।
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06/01/2025
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