पहचान
रुक - सब झाँक रहे
जाने क्या इस कुएं अंदर
परछाई तक अपनी - नहीं पहचान पा रहे
बस बताते, यह तुम ।
अजीब धुँआ सा, हल्का पर
असरदार
सबको मदमस्त किये जा रहा
सफर को भूल, झुके खड़े सब।
जाने कितना कुछ बदल गया
पर सब निर्लिप्त ,
सब कुछ सुन्न , बस जगमगाती आंखें ।
अद्भुत यह कुआँ अजब यह धुँआ,
प्यास बुझाने कोई नहीं, ना कोई इन्हें जगाने ।
कोई बताये भी इन्हें
अनसुना कर देते।
पगडंडियाँ सी बिछी, कारवां आते
कतरा कर मैं भी निकलूं
बहुत कुछ निखरा फैला
मेरे चहूँओर
ठिठक सा गया
एक झलक एक झिझक
थामे मेरे कदमों को।
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06/01/2025
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