Thursday, January 8, 2026

जब भी समुन्दर को देखता - 

सिहरन सी दौड़ जाती,

रश्क सा होने लगता,

उमड़ फैलती लहरों को देख ।

रंग समुद्र के बिखराती  किनारों पर

नाराज - तो सीपों से भरी लहरें

एक आध मोती से खुशियाँ लुटाती ।

 

एक के बाद एक, अगिनत

किनारे तक आती फिर ओझल ।

देख रहा - मंडराते पंछियों का झुंड

लहरों को देख, गोता लगाते

मछलियाँ पकड़ - फिर ऊपर

सीपी हो या मोती - किनारे ही धरे रह जाते ।

 

सुना है मैंने, अलग ही दुनिया बसा रखी,

इसने अपने अंदर ।

पानी खारा ही हो, पर मेरी दुनिया से नहीं अलग

एक दूसरे से हम नहीं परे ।

लहरों के साथ-साथ, किनारे किनारे,

इस रेत पर, मैं आगे बढ़ता

पदचिन्ह मेरे देख रहा

ओझल होते - लहरों से

कभी रोष में, तो कभी खिलखलाते

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08 Jan 2026


 

पहचान

 

रुक - सब झाँक रहे

जाने क्या इस कुएं अंदर

परछाई तक अपनी - नहीं पहचान पा रहे

बस बताते, यह तुम

अजीब धुँआ सा, हल्का पर असरदार

सबको मदमस्त किये जा रहा

सफर को भूल, झुके खड़े सब।

 

जाने कितना कुछ बदल गया

पर सब निर्लिप्त ,

सब कुछ सुन्न , बस जगमगाती आंखें ।

अद्भुत यह कुआँ अजब यह धुँआ,

प्यास बुझाने कोई नहीं, ना कोई इन्हें जगाने ।

कोई बताये भी इन्हें

अनसुना कर देते।

पगडंडियाँ सी बिछी, कारवां आते

कतरा कर मैं भी निकलूं

बहुत कुछ निखरा फैला

मेरे चहूँओर

ठिठक सा गया

एक झलक एक झिझक

थामे मेरे कदमों को।

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06/01/2025

 

प्रतीक्षा

 

जाने कब से बसे हैं

यह तीन मेरे अंदर

कोई किसी से अनभिज्ञ नहीं

फिर भी सबसे अलग ।

 

निकल जाता एक, सुबह-सुबह

नाँव अपनी लिए - बीच समुन्दर

जाल डाल समुद्र में

बाँसुरी बजाता, डगमगाती नाँव पर

मछलियां चुन, किनारे शाम तक

 

दूसरा चल पड़ता, भरी - भोर सुबह

मस्त अल्हड़ सा बहती पवन संग

कोई मंजिल नहीं बस खुशबूओं से

लहराता बहता झोंके हवाओं के

पर लौटता वह - भी रात देर तक

 

तीसरा जाने कब से निकला -  टीस एक छोड़ गया

उस दूर- सुदूर पर्वत कंदरा में

जंगलों के पार - अब तक बैठा आंखें मूंद

गुफा की कोट में ।

सारी आवाजों से ओझल

खुद को खो जाने किसकी लगन ।

 

मैं इस - सागर किनारे

मिलता सबसे - सब बतियाते

इंतजार में तीसरे के फिर सब गुमसुम,

दूर आकाश देखते टिमटिमाते सितारे

कोई टूट रहा, तो कोई झिलमिल रहा 

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06/01/2025

 

अहं

अब तराशने लगे

नदियों को पत्थर

आजाद जिन्हें किया

पहाड़ों की कैद से ।

कतरा इनसे - किनारे बहने लगे

नए रास्ते पर, कल - कल करता पानी ।

 

अब टकराने लगे पत्ते

बहती हवाओं से ।

बचाया जिन्हें- धूप बारिशों से

हौले से अब कतरा - निकल जाता

एक झोंका ।

 

सब कुछ बदल जाता

प्रकृति की गोद में

ढलते उगते सूरज संग,

चाँद, सितारे भी जगमगाते

नदियों को मिलना सागर संग

पवन को ले चलना खशबूओं को ।

 

मुस्कुराता देखता

ठोकरों में पड़े पत्थर

मिट्टी में मिलते पत्ते

अस्मिता अपनी मिटा रहे

पहचान बनाने के अहं । 

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26/12/2025

Saturday, December 20, 2025

 मचलता मन 

दूर पहाड़ों को देख
मचलने लगा मन।
चल पड़ा धुन में अपनी
दिल में एक अलख लगन।

घुमावदार रास्ते,
दलदली जमीन कहीं
तो कहीं पथरीली कांटों भरी झाड़ियां।
छलनी कर देती।
पर पहाड़ी की चोटी
बार-बार मन को लुभा रही।
मैं चलता  जाता
रास्ते अपने ही बनाता जा रहा,
अनजान - सियाल, बिच्छू, सांपों से।

अब ऊपर चढ़ना -
कोई पगडंडी नजर नहीं आ रही
वो जो दूर से - दिख रही थी  पहाड़ी अद्भुत
अब विकराल, भयावह ,
पत्थरों और पेड़ों का समूह।  
आवाजें  गूंज रही झरनों की
पर नजर में एक भी नहीं।
आवाजें  हिंसक जानवरों की घुल मिल जा रही
पंछियों की चहचहाट में।  
हवाओं की सरसराहट संग।  

थोड़ा सा सुस्ता लूँ ,
मन को समझा लूँ
जो दूर से दिख रही - अद्भुत
अब देख उसे - क्यों त्रस्।
मेरी छाया, होने लगी लंबी मुझसे ,
शायद शाम  होने को आई।
हौले - हौले कदम बढ़ाता,
कुछ देर - थक साँसें भरता
चहुँओर अपने निहोराता
अजीब सी खामोशी-  चुपके से कहती ,
थोड़ा और।
फिर कदम उठते - वो छवि जो
दूर से देख मन में उंकेरी
धूमिल होती गई।
परत एक नई - उस पर बस गयी ।
चाल धीमी हो गई - पर फासले भी ज्यादा नहीं रहे।
चलता रहा - कुछ और,
साँझ  से रात - पर रुके नहीं कदम मेरे।
पत्थरों को कभी थामता ,
कभी जड़ों को ,
तो कभी बेलों को।  
पहुँच ही गया आखिर चोटी तक
अब और कदम उठाए नहीं उठाते।  
एक पत्थर पर - सुस्ताने बैठा
अचानक आँखें - दूर क्षितिज पर
टिमटिमाते से नजर आ रहे
दूर-सुदूर गाँव।
भोर भी होने लगी,
अब साफ नजर आते
लहलहाते खेत - हरे।
उतर गई थकान सारी,-चारों तरफ
अद्भुत नजार।  
फिर मचलने लगा मन -
देख टिमटिमाते गांव
हरे-भरे खेतों की ओट से - लेने सौंधी मिट्टी की खुशब।

पर - यह क्या देख रहा -
एक बिंदु काली सी - पहाड़ी की तलहटी प।
एक और सफर में - इस चोटी पर।
उलझन में मन -
पैर  बढ़ाऊँ -  या यहीं ठहर जाऊ।
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Dec  २०/२०२५

Tuesday, December 9, 2025

 

समय के पार

 

बचपन में देखा मैंने

बैलगाड़ी का पगडंडियों से गुजरना।

वो बैलों के गले की घंटियाँ

सुनाई देती थी दूर दराज मोड़ों से।

रोक साईकिल अपनी

रास्ता देता गुजर जाने उनको।

देर तक देखता

एक गुबार हल्का सा धूल का।

 

बीतते समय के साथ

साईकिल छूटी स्कूटर आया।

बैलगाड़ी ने किया किनारा

मोटर कारें दौड़ी और

छिपा दी पगडंडियाँ

लंबी चौड़ी सड़कों ने

किनारा अब भी कर देता

देखता जब उगलता धूंआ जहरीला।

समा जाता, रग रग में मेरे

भाग रहा समय के साथ

ना धूल ना धूँआ

बस बदहवास।

 

आज- एक युग सा बीत गया

जमीन से ना जाने कितने ऊपर

रूई से उड़ रहे बादल इर्द गिर्द

ना कोई सड़क ना ही पगडंडी

ना कोई धूल ना ही वो घंटी

बस देख रहा नीचे

इस विमान से नीचे

खेत खलिहान, नदी तालाब

रंग बिरंगी बिछी एक चादर

बिंदु मात्र नज़र रहे सब कुछ।