Saturday, November 29, 2025

 

ज़िंदगी

तमाम समय ज़िंदगी

भागती रही गलियारे में

और द्वार पर पहुँच

दुबक , बैठ गयी.

 

रौशनी के लिए

फिरता रहा जंगल सारा

जब देखी किरण

हल्की सी

भींच बंद कर ली

आँखें , उसने.

 

परत दर परत

सहेजता  रोज रात चांदनी.

बिखेर देता

इधर-उधर

देख सागर पार सूरज.

 

शब्दों के ताने बाने बुन

देर सफ़र में रहा साथ,

फिर भी राही को

शिकायत ही रही

जब तनहा कर गया ,

मंजिल के पास.

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