ज़िंदगी
तमाम
समय ज़िंदगी
भागती
रही गलियारे में
और द्वार पर पहुँच
दुबक
, बैठ गयी.
रौशनी
के लिए
फिरता
रहा जंगल सारा
जब देखी किरण
हल्की
सी
भींच
बंद कर ली
आँखें
, उसने.
परत
दर परत
सहेजता रोज
रात चांदनी.
बिखेर
देता
इधर-उधर
देख
सागर पार सूरज.
शब्दों
के ताने बाने बुन
देर
सफ़र में रहा साथ,
फिर
भी राही को
शिकायत
ही रही
जब तनहा कर गया
,
मंजिल
के पास.
No comments:
Post a Comment