Saturday, November 29, 2025

 Leading ghazal Poets Two liners

अहमद फ़राज़

1.ग़म--दुनिया भी ग़म--यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

2.कुछ तो मिरे पिंदार--मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए

3.डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा

4.जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान--सफ़र
कुछ और दूर ज़रा साथ चल के देखते हैं

5.इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब
इतना याद कि तुझे भूल जाएँ हम

6.ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे

7.यूँही मौसम की अदा देख के याद आया है
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इंसाँ जानाँ

8.कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते

9.ये ख़्वाब है ख़ुशबू है कि झोंका है कि पल है
ये धुँद है बादल है कि साया है कि तुम हो

10.जब भी दिल खोल के रोए होंगे
लोग आराम से सोए होंगे

11.ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया
अभी अभी तो अज़ाब--सफ़र से निकला था

12.तेरी बातें ही सुनाने आए
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए

13.कैसा मौसम है कुछ नहीं खुलता
बूँदा-बाँदी भी धूप भी है अभी

14.ख़ुश हो दिल कि मोहब्बत तो निभा दी तू ने
लोग उजड़ जाते हैं अंजाम से पहले पहले

15.हम कि दुख ओढ़ के ख़ल्वत में पड़े रहते हैं
हम ने बाज़ार में ज़ख़्मों की नुमाइश नहीं की

16.यूँही मर मर के जिएँ वक़्त गुज़ारे जाएँ
ज़िंदगी हम तिरे हाथों से मारे जाएँ

17.जिन के हम मुंतज़िर रहे उन को
मिल गए और हम-सफ़र शायद

18.लोग हर बात का अफ़्साना बना देते हैं
ये तो दुनिया है मिरी जाँ कई दुश्मन कई दोस्त

19.किसे ख़बर वो मोहब्बत थी या रक़ाबत थी
बहुत से लोग तुझे देख कर हमारे हुए

20.क्या लोग थे कि जान से बढ़ कर अज़ीज़ थे
अब दिल से महव नाम भी अक्सर के हो गए

मशहूर शायर वसीम बरेलवी के 20 बड़े शेर

1.अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे

2.मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

3.झूट वाले कहीं से कहीं बढ़ गए
और मैं था कि सच बोलता रह गया

4.उस ने मेरी राह देखी और वो रिश्ता तोड़ लिया
जिस रिश्ते की ख़ातिर मुझ से दुनिया ने मुँह मोड़ लिया

5.उसे समझने का कोई तो रास्ता निकले
मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले

6.क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर--दर मैं ने किया
उम्र-भर किस किस के हिस्से का सफ़र मैं ने किया

7.दिल की बिगड़ी हुई आदत से ये उम्मीद थी
भूल जाएगा ये इक दिन तिरा याद आना भी

8.एक मंज़र पे ठहरने नहीं देती फ़ितरत
उम्र भर आँख की क़िस्मत में सफ़र लगता है

9.चाहे जितना भी बिगड़ जाए ज़माने का चलन
झूट से हारते देखा नहीं सच्चाई को

10.तुम साथ नहीं हो तो कुछ अच्छा नहीं लगता
इस शहर में क्या है जो अधूरा नहीं लगता

11.मोहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है
ये रूठ जाएँ तो फिर लौट कर नहीं आते

12.जो मुझ में तुझ में चला रहा है सदियों से
कहीं हयात उसी फ़ासले का नाम हो

13.दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता
तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता

14.निगाहों के तक़ाज़े चैन से मरने नहीं देते
यहाँ मंज़र ही ऐसे हैं कि दिल भरने नहीं देते

15.जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

16.वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता
मगर इन एहतियातों से तअल्लुक़ मर नहीं जाता

17.हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें
ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें

18.हम अपने आप को इक मसअला बना सके
इसलिए तो किसी की नज़र में सके

19.आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है
भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है

20.ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं
तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी

गुलज़ार की टॉप 20 शायरी

1.आप के बा' हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है

2.ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा

3.शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है

4.कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ़
किसी की आँख में हम को भी इंतिज़ार दिखे

5.वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
आदत इस की भी आदमी सी है

6.कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ
उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की

7.आदतन तुम ने कर दिए वादे
आदतन हम ने 'तिबार किया

8.जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ
उस ने सदियों की जुदाई दी है

9.हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते

10. हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में
रुक कर अपना ही इंतिज़ार किया

11.तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते हैं
सज़ाएँ भेज दो हम ने ख़ताएँ भेजी हैं

12.ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में
एक पुराना ख़त खोला अनजाने में

13.जब भी ये दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है

14.अपने माज़ी की जुस्तुजू में बहार
पीले पत्ते तलाश करती है

15.दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसाँ उतारता है कोई

16.चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं
दिल को पिघलाएँ तो हो सकता है साँसें निकलें

17.देर से गूँजते हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई

18.रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले
क़रार दे के तिरे दर से बे-क़रार चले

19.ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा
वगर्ना ज़िंदगी भर को रुला दिया होता

20.भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आँखों में
उजाला हो तो हम आँखें झपकते रहते हैं

राज कैसे पहुंच गए गैरों तक,
मशवरे तो हमने अपनों से किए थे। 

 

No comments:

Post a Comment